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फूटा ठीकरा
शेख बच निकला
तू था मुहरा

 

ढूंढ़ बकरा
शनैः रेत लो गला
दे चारा हरा

 

बेजुबाँ खरा
हक माँगने लगा
तो दोष भरा

 

अना दोहरी
नश्तर सी चुभन
दगा अखरी!

 

यहाँ खतरा
ईश्वर हुआ अंधा
इन्सां बहरा

 

यार बिसरा
अब यहाँ क्या धरा
चलो जियरा

 

छटा कुहरा
छद्म बंधन मुक्त
पिया मदिरा

 

समा ठहरा
इंद्रधनुषी दुनिया
नशा गहरा

 

नेत्र बदरा
लगा झरझराने
रक्त बिखरा

 

नशा उतरा
आई घर की याद
बुझा चेहरा

 

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Comment

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Comment by वीनस केसरी on March 23, 2012 at 12:56pm

सुन्दर सलोने हाईकू

विशेष बधाई

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 4, 2012 at 5:47pm

ashutosh ji, namaskaar. aapki dad mili, rachna dhanya ho gai.

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 4, 2012 at 5:46pm

माननीय सौरभ जी, सादर नमस्कार, आपकी नीर-क्षीर विवेचना सुन कर दिल आह्लादित हो उठा है. आपने जिस तरह से हाइकू की नब्ज़ें पकड़ी हैं, वह वास्तव मे एक उच्च कोटि का लेखक ही कर सकता है. अब जब मैं आपके सनिध्य मे आ ही गया हूँ, आपके आशीर्वाद और मार्गदर्शन की हमेशा अपेक्षा रहेगी. आपकी आलोचना ही मेरा उपहार रहेगा इस मंच पर. बाकी तो अभी इतनी तारीफ पचा सकने मे 1-2 दिन लगेगा. तब तक फूला फूला मन लिए घूमता रहूँगा.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 4, 2012 at 12:18pm

आज का दिन मानों सँवर गया.  उत्तम !

शिल्प, कथ्य, भाव, शब्द हर तरह से उच्च स्तर के इन दस हाइकुओं पर हुए आपके सुप्रयास हेतु पाठकीय अनुमोदन स्वीकार करें.

पहले तीन हाइकुओं की अंतर्धारा महीन किन्तु अत्यंत वेगवती है. इसके प्रवाह में देर तक बहना पाठकीय अभीष्ट सा है.

आखिरी हाइकू में निहित द्वैत भाव से अत्यंत अभिभूत हुआ हूँ, बधाई स्वीकार करें. बहुत ही गहरी कहन है. बहुत ही गहरी ! वाह !!

प्रयासरत रहें, राकेशजी.  आपकी संभावनाओं भरी उपस्थिति से मंच के अमूमन सभी सदस्य अभिभूत हैं. 

शुभेच्छाएँ.

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 4, 2012 at 7:58am

मान्यवर बागी जी, सुप्रभात. आपने सही कहा. मैने भी इसे अपनी व्यक्तिगत अभिरुचि तक ही सीमित मान रहा हूँ. अच्छा लिखने का प्रयास जारी रहेगा. 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 3, 2012 at 10:54pm

भाई राकेश जी, एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ , ओ बी ओ पर झाड पर चढ़ाने का काम कभी नहीं हुआ है, यह साईट सीखने-सिखाने के लिये उचित मंच प्रदान करता है.   रही बात रचना की तो मैं यही कहूँगा कि पसंद अपनी अपनी,

यदि भाई आनंद जी को कुछ कमी लग रही है तो खुल कर बतायें जिससे आप के साथ साथ हम सभी लाभान्वित हो सकें |

सादर |

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 3, 2012 at 10:31pm

मान्यवर आनंद जी, अब आप हमारे पक्के मित्र हो गये हैं, जो की मुझे उचित सलाह दे रहे हैं, आपका हर शब्द मेरे लिए विचारनीय है. रही बात जल्दी मे लिखने की, तो ऐसा नही है, काफ़ी वक्त लिया था मैने. पर मैं अब भी थोड़ा असमंजस मे हूँ कि कहीं योगराज जी और बागी जी मेरी झूठी तारीफ तो नही कर रहे.  :)

बागी जी, आपकी तारीफ से मैं खुश बहुत हुआ हूँ, किंतु एक संदेह जो मान मे बैठ गया है, निकल ही नही रहा है. आप निदान करें. सादर धन्यवाद.

इस बात को साफ करना पड़ेगा नही तो मुझे इस मंच का पूर्ण लाभ नही मिल पाएगा. मुझे सिर्फ़ वाह-वाह करने से क्या फ़ायदा होगा. आप भद्र जन इस बात पर विचार करें, मेरी अच्छा लिखने की कोशिश जारी रहेगी. साभार.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 3, 2012 at 9:43pm

५-७-५ वर्णों में कहानी रच देना, आसान नहीं होता, साथ में तुकांत निभाते हुए, बस एक शब्द, बेहतरीन , बधाई स्वीकार करें , अच्छी प्रस्तुति |

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 3, 2012 at 2:54pm

प्रदीप सर सादर, आपके आशीर्वाद हेतु पुनः नतमस्तक. अना दोहरी मतलब, दोहरा व्यक्तित्व. 

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 3, 2012 at 1:16pm

माननीय योगी जी, वस्तुतः मैं सब को 'रा' से समाप्त करना चाह रहा हूँ. इसलिए असमंजस है की 'री' लाने पर "Odd man out" ना हो जाए. जब तक कुछ और ना ढूँढ लू, तब तक दोहरी ही लिखा लेता हूँ, व्याकरण संबंधी जानकारी के लिए धन्यवाद.

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