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लुत्फ़-ए-बुढ़ापा

लुत्फ़-ए-बुढ़ापा 


एक कतरा दर्द-ए-दिल का उनके ही काम आया

जब मिला न कोई हमदर्द तो यही काम आया  
हम तो 'दीपक' की मानिंद जले जलते गए
मेरा रोना भी उन्हें शायद न यूँ रास आया
हम लिखें कितना लिखें कुछ भी नहीं होता है 
मेरी हालत पे उन्हें इक पल न तरस आया 
मौत आई न हमें जिंदा रहे साँस बिना
ज़िंदगी नें इस तरह से हमें यूँ ठुकराया 
अब तो मुरझा गए चेहरे होंठ सूख गए
दूर रहकर हमसे देखो तुमने भी क्या पाया 
अब भी आ जाओ मेरे पहलू में हम बुलाते हैं
फिर न कहना की बुढ़ापे का लुत्फ़ ठुकराया  

दीपक कुल्लुवी 
28 मार्च 2012 .
9350078399
एक ग़ज़ल जैसी लगती मेरी यह रचना आपको व्यंगात्मक अंत का दर्शन करवाएगी I

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Comment by Deepak Sharma Kuluvi on March 29, 2012 at 2:10pm

DHANYABA HARISH JI

Comment by Harish Bhatt on March 29, 2012 at 1:35pm

आदरणीय दीपक सादर प्रणाम, शानदार रचना के लिए हार्दिक बधाई.

Comment by Deepak Sharma Kuluvi on March 29, 2012 at 12:44pm

DR. SAHIB

AAP KAH RAHE HO SUNDAR RACHNA...IKLOTI BIBI KAL NARAZ HO GAYI YAH  PADKAR.....

DHANYABAD

Comment by Dr Ajay Kumar Sharma on March 29, 2012 at 12:35pm

सुंदर  रचना ..बधाई 

Comment by Deepak Sharma Kuluvi on March 29, 2012 at 10:22am

shukriya rajesh kumari ji v pradeep ji


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 29, 2012 at 8:06am

bahut sundar rachna really antim pankti ne to kahani hi badal di.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 28, 2012 at 8:02pm

अब भी आ जाओ मेरे पहलू में हम बुलाते हैं

फिर न कहना की बुढ़ापे का लुत्फ़ ठुकराया  
tarah tarah se ham unko pass bulate hain
aur vo hain ki budhape main bhi navyovna ki tarah ithlate hain
bahut khoob kaha deepak sir ji. aapne. badhai.

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