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जय जय ओ.बी.ओ.  जय जय ओ.बी.ओ. 

आओ हम सब मिलकर गायें 
ओ.बी.ओ. महान है 
भटकते फिरते जो ज्ञान की खातिर 
उनके लिए वरदान है 
जय जय ओ.बी.ओ.  जय जय ओ.बी.ओ.  ..२ बार 
गजल छन्द कई भाषाओँ के  उपलब्ध  विधान हैं 
कहानी  कविता का  मिलता यहाँ सम्यक ज्ञान है 
जय जय ओ.बी.ओ.  जय जय ओ.बी.ओ.  ...२ बार 
नए पुराने धर्म जाति का न कोई भेद है 
भिन्न भिन्न विधा है सबकी आपस में एक हैं 
जय जय ओ.बी.ओ.  जय जय ओ.बी.ओ.  ...२ बार 
लिखो कविता या कहानी श्रेष्ठ को मिले  पुरूस्कार है
नहीं होती किसी को  ईर्ष्या ऐसा सुखी परिवार है. 
जय जय ओ.बी.ओ.  जय जय ओ.बी.ओ.  ...२ बार 
प्रीतम और रवी का पौधा सींचते बागी हैं 
बड़े बड़े दिग्गज यहाँ साहित्य सुधा के रागी हैं 
जय जय ओ.बी.ओ.  जय जय ओ.बी.ओ.  ...२ बार 
आओ सब मिलकर ऐसी अलख जगाये हम 
साहित्य समरसता की पावन गंगा बहायें हम 
जय जय ओ.बी.ओ.  जय जय ओ.बी.ओ.  ...२ बार 
कई भाषाओँ और विधा में पारंगत गुरु विद्या दान करें 
माँ भारती , सरस्वती संग ओ.बी.ओ. का गुण गान करें 
जय जय ओ.बी.ओ.  जय जय ओ.बी.ओ.  ...२ बार 
जय ओ.बी.ओ. , जय हिंद, वन्दे मातरम् 

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Comment

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 6, 2012 at 9:42pm

स्नेही मृदु जी , सादर  ,   आईये हम सब मिल गायें जय ओ.बी.ओ.. धन्यवाद. स्नेह बनाये रखिये. 

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 6, 2012 at 9:37pm

ओ बी ओ के प्रति ऐसे उन्नत भावों से लिखी गई रचना पर बधाई स्वीकार करें सर

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 6, 2012 at 9:37pm

आदरणीय केसरी जी, सादर,   आप भाव के प्रति नतमस्तक हैं मेरा प्रयास सफल हुआ. मैं आपकी इस भावना के प्रति नतमस्तक हूँ, धन्यवाद. स्नेह बनाये रखिये. 

Comment by वीनस केसरी on April 6, 2012 at 12:48am

वाह प्रदीप जी, इस सुन्दर भावना के सम्मुख नत हूँ

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 5, 2012 at 10:52pm

स्नेही वाहिद जी.,  सादर , अब भी कहने की बात है. हम लोग कहाँ से जुदा जुदा दीखते हैं. धन्यवाद. प्रोत्साहन हेतु. 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 5, 2012 at 10:51pm

आदरणीय सौरभ गुरु जी.,  सादर प्रणाम  हीरा न भी बनू पर ये सौभाग्य क्या कम है की आप जैसी संगत में खड़े होने को मिला और बात होती है. धन्यवाद. प्रोत्साहन हेतु. 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 5, 2012 at 10:48pm

आदरणीय बागी जी,  जीवन के शेष क्षण राष्ट्र के काम आ जाएँ बस. साहित्य सेवा भी राष्ट्र का एक अंग हैं. आप विद्वानों की तरह मैं मंदिर की मूर्ति में बसा भगवान् तो नहीं हूँ हाँ सफाई का का कार्य ही करता हूँ.  ओ.बी.ओ. गीत मेरी तमन्ना है.  अगर कार्यक्रम में बजे तो अच्छा रहेगा. धन्यवाद. प्रोत्साहन हेतु. 

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on April 5, 2012 at 8:30pm

आपके ही विचार मेरे भी विचार हैं! एक तरह से आपने मेरे भावों को भी शब्द दे दिए हैं| आपके लिए कोटिशः बधाईयां!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 5, 2012 at 6:23pm

आदरणीय प्रदीपजी,  हमें मालूम है इस मंच के प्रति आपका लगाव और सदस्यों के प्रति आपकी सदाशयता ने आपको इस गीत की प्रेरणा दी है. हम सभी आपकी इस साहित्यिक यात्रा के भाग्यशाली गवाह हैं.  यह वाकई रोचक है.

आपका निरंतर लेखन ही आपका प्रथम गुरु है आदरणीय.  मैं ऐसा आपके सीखने की भाव-तीव्रता के क्रम में आप द्वारा हुए उद्बोधनों, जिसे आपने इस मंच की कई-कई टिप्पणियों में खुल कर किया है, के कारण कहने की हिमाकत कर रहा हूँ.

इस गीत की भाव-दशा प्रणम्य है.  सादर.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 5, 2012 at 5:33pm

आदरणीय प्रदीप जी, ओ बी ओ के प्रति आपके भावनाओं को सलाम तथा इस अभिव्यक्ति पर साधुवाद |

कृपया ध्यान दे...

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