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' जान ' तू मर गयी थी
सदियों पहले
और किसी को
पता न चला
कुछ भी..
और शायद
कोई बड़ी बात नहीं की,
तू मर गयी हो अब भी !
और..
पता न चल सके
मुझको भी /
हत्यारा कौन था ?
या
हत्यारा कौन है !
क्या करूँगा मैं यह जानकर
जबकि, एक हत्यारा तो हरदम
साथ रहता है
मेरे भी....
और
शनः - शनः जान रहा हूँ मैं की
निरंतर
होती रही इन हत्याओं का तारतम्य ही
है शायद
"जीवन-चक्र "
© AjAy Kum@r

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Comment

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Comment by AjAy Kumar Bohat on May 13, 2012 at 7:35pm

सभी आदरणीय कवि मित्रों का शुक्रिया, आशा है आगे भी स्नेह बनाये रखेंगे....

Comment by Abhinav Arun on April 14, 2012 at 12:54pm

अच्छे प्रवाहमय विचारों की ताजगी भरी कविता हार्दिक बधाई श्री अजय जी !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 14, 2012 at 4:27am

भाव प्रस्तुतिकरण के लिये धन्यवाद, अजय जी.

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 13, 2012 at 9:00pm

शनः - शनः जान रहा हूँ मैं की
निरंतर
होती रही इन हत्याओं का तारतम्य ही
है शायद
"जीवन-चक्र "      खूबसूरत अभिव्यक्ति के लिए बधाई स्वीकार करें 

Comment by MAHIMA SHREE on April 13, 2012 at 2:33pm
आदरणीय अजय जी,
नमस्कार बहुत ही कठोर जीवन चक्र का दार्शिनिक अभिवयक्ति जो कई रूपों में सटीक बैठ रही है..
बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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