चश्मे तो हमने राह में पाये हैं बेशुमार
तेरी ही तिश्नगी में आये हैं बार- बार
प्यार से बिठाया और खुशियाँ लूट ली
धोखे यूँ जिंदगी में खाये हैं कई हजार
सीमाएं मेरे दर्द की वो नाप के गए
अश्क जब काँधे पे बहाये हैं ज़ार-ज़ार
बता गमजदा दिल अब कैसे ढकें बदन
खुशियों के पैरहन कर लाये हैं तार-तार
वादियों में बुलबुलें अब चहकती नहीं
जब दर्द के गुबार ने तडपाये हैं चिनार
कैसे सुकून पाये 'राज' इस जहान में
नफरतों की आग ने सुखाये हैं आबशार
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Comment
'चश्मे तो हमने राह में पाये हैं बेशुमार
तेरी ही तिश्नगी में आये हैं बार- बार
कैसे सुकून पाये 'राज' इस जहान में
नफरतों की आग ने सुखाये हैं आबशार'
बहुत खूब फरमाया है. सुकूं मिला गज़ल पढ़ कर. आप 'राज' नाम से लिखती है, जानकार अच्छा लगा. आपके और मेरे तखल्लुस में बस एक नुक्ते का फेर है. - राज़
अशोक कुमार रकतेला जी हार्दिक आभार खुश हूँ जानकर की ग़ज़ल आपको पसंद आई
डा. सूर्या बाली जी हार्दिक आभार
राजेश जी
सादर,
प्यार से बिठाया और खुशियाँ लूट ली
धोखे यूँ जिंदगी में खाये हैं कई हजार
सीमाएं मेरे दर्द की वो नाप के गए
अश्क जब काँधे पे बहाये हैं ज़ार-ज़ार
बहुत सुन्दर भाव. हार्दिक बधाई.
सुंदर एवं भाव प्रधान रचना के लिए दिली दाद कुबूल करें राजेश कुमारी जी !! बहुत सुंदर !
उमा शंकर मिश्र जी तहे दिल से शुक्रिया आपकी प्रतिक्रिया से हम बाग़ बाग़ हो गए
प्यार से बिठाया और खुशियाँ लूट ली
धोखे यूँ जिंदगी में खाये हैं कई हजार
सीमाएं मेरे दर्द की वो नाप के गए
अश्क जब काँधे पे बहाये हैं ज़ार-ज़ार
बेहतरीन,लाजवाब ,तारीफे काबिल बहुत अच्छा लगा दिल तार तार हो गए
प्रिय महिमा श्री जी हार्दिक आभार आपकी सुखद टिपण्णी हेतु
तहे दिल से शुक्रिया सुरेन्द्र कुमार भ्रमर जी
डा .सूर्या बाली जी तहे दिल से शुक्रिया
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