तेरी निगाह की जादूगरी मैं कैसे लिखूं
दिखी तराश जो हुश्ने-परी मैं कैसे लिखूं
यहाँ 'न' दिल बिका पामाल का चाहत के लिये
दिवानगी लगी सौदागरी मैं कैसे लिखूं
न कायनात सी दिलकश यहाँ पे शै है कोई
खुदा बता तेरी कारीगरी मैं कैसे लिखूं
न तोड़ आइना झूठा कभी ये होगा नहीं
बड़ी कमाल है शीशागरी मैं कैसे लिखूं
कभी न तुम रोना "दीप" जिसने वादा लिया
गजाल सी वही आँखें भरी मैं कैसे लिखूं
संदीप पटेल "दीप'
Comment
bahut bahut shukriya aapka @yogi saraswat ji ....................aapka saadar aabhar
बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखी है संदीप कुमार जी
न कायनात सी दिलकश यहाँ पे शै है कोई
खुदा बता तेरी कारीगरी मैं कैसे लिखूं
बहुत सुन्दर ग़ज़ल , श्री संदीप पटेल जी ! एक एक अश'आर बहुत खूब !
आदरणीय अलबेला सर जी
मेरा मनोबल बढाने के लिए
आपका बहुत बहुत शुक्रिया और सादर आभार
सादर वन्दे
waah Sandeep Patel ji,
bahut khoob !
badhaai
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