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राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ३३

(आज से बारह वर्ष पूर्व लिखी रचना)              

दिल में बसे अंजान रास्ते..

 

दिल में भी हैं बसे

कई अंजान रास्ते

जिनकी वाक़िफ़त शायद

इक उम्र ले लेगी मेरी हैरान आँखों से चुराकर।

 

अच्छे, बुरे-जैसे भी हैं लोग गिर्दोपेश में

जो हमसाये हैं या हमसफ़र

या जो गुज़र गये बहुत पास आकर

सब, कहीं न कहीं बसे होतें हैं

इन्हीं अन्जान रास्तों पर

जो दिल में बसे तो होते हैं मगर

जिनके क़ुर्ब से फ़िर भी आती है

मुग़ायरत की इक दर्दखेज़ सहर

दिन गुज़रता है आलूदा पसोपेश में

कशमकश लिये आती है रात मेरे अंदर

वही दरवाज़े, वही खिड़कियाँ, वही दीवारोदर

मगर,

दिल में बसे अंजान रास्तों की

उसे भी नहीं है ख़बर

जो लगते हैं कभी बहुत तवील

तन्हाईयों के फ़ासलों में फैले

तुम्हारी आँखों के समंदर

और जो कभी लगते हैं

तुम्हारी मुलाक़ात की मानिंद

सिमटे, सहमें मुख़्तसर।

 

© राज़ नवादवी

अलीगंज, लखनऊ,

(अप्रिल २०००) 

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Comment

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Comment by राज़ नवादवी on July 3, 2012 at 10:27pm

धन्यवाद सौरभ भाई, आपकी इक इक तहसीन मेरे लिए इक बाइसेफक्र है. ज़रूर, आइन्दा इस बात का ख़याल रखूंगा कि लफ़्ज़ों के मायने भी साथ लिखूं. आपकी तजवीज़ सर आँखों पे


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 1, 2012 at 1:27pm

भाई राज़ साहब, बहुत ही सुन्दर कहन और उतनी ही उम्दा कोशिश.

यह कविता बहुत कुछ कहती जाती है. और कहने का लिहाज प्रवहमान है.

एक गुज़ारिश :   उर्दू या हिन्दी के अप्रचलित शब्दों के अर्थ हम रचना के ठीक नीचे दे दिया करें तो सामान्य पाठकों को रचनाओं को सम्पूर्णता में लेने और फिर समझने में आसानी होगी. उनका रचना के प्रति जुड़ाव भी पैदा होगा.

सादर 

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