दुनिया
चाँद धरा पे लाना है
सूरज को पिघलाना है
सागर को भर अजुरी में
बादल को बरसाना है
है अंत जहां भी आसमान का
उससे ऊपर उड़ जाना है
ये दुनिया चाहे जिसकी भी हो
मुझे अपनी दुनिया बनाना है
गिर जाऊं जो कभी रस्ते पर
फिर उठ के बढ़ जाना है
दुःख के पेट पे फेर के उंगली
उसको भी गुदगुदाना है
हार से कभी हारू न मैं
जीत से भी जीत जाना है
ये दुनिया चाहे जिसकी भी हो
मुझे अपनी दुनिया बनाना है
सबसे ऊँचा है जो हिमालय
उसके भी शीष झुकाना है
ये मौसम जो मनमौजी है
उसके मन को समझाना है
ये समय जो कभी रुकता नहीं
मुझे इसको भी ठहराना है
ये दुनिया चाहे जिसकी भी हो
मुझे अपनी दुनिया बनाना है
धुप के संग कर भागा दौड़ी
उसके पसीने छूटवाना है
हवा को अपनी सांस बनाकर
बर्फ को भी ठण्ड लगाना है
टिमटिम तारो को भर मुट्ठी में
जेबों में अपनी खनकाना है
ये दुनिया चाहे जिसकी भी हो
मुझे अपनी दुनिया बनाना है....
रणवीर प्रताप सिंह
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