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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- २६

तेरे बगैर मज़ाभी क्या आये जीने का

शराब न हो तो क्या हो आबगीने का

 

तेरी ज़ुल्फ़से दोचार नफ्स मांग लेतेहैं

तेरेही इश्कने काम बढ़ाया है सीने का   

 

तू नमाज़ी है तो पाबन्द है औकातका

मैं खराबाती हूँ कोई वक्त नहीं पीनेका

 

नतुम न दरियएइश्क पार करनेको है

नाखुदा है खुदा काम क्या सफीने का

        

राज़ ज़रा संभल के खर्च करो मआश

अभीतो पूरा महीना पड़ा है महीने का    

 

© राज़ नवादवी

बैंगलोर, प्रातःकाल ०७.४१, मंगलवार, ११/०९/२०१२

 

आबगीने- शराब रखने की खूबसूरत बोतल; नफ्स- सांस; औकातका- समय का; खराबाती- शराबी; नाखुदा- नाविक; सफीना- नाँव; मआश- पैसे, जीवन निर्वाह का साधन  

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Comment by राज़ नवादवी on September 20, 2012 at 11:33pm

शुक्रिया भाई प्रमेन्द्र !

Comment by प्रमेन्द्र डाबरे on September 20, 2012 at 11:30pm

राज़ साहब आपका जवाब नहीं. आप लाजवाब कर देते है आपकी ग़ज़ल पढ़ने वाले को.

Comment by राज़ नवादवी on September 13, 2012 at 9:59am

शुक्रिया अम्बरीश जी, आपकी दाद सर आँखों पे !

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 12, 2012 at 9:10am

इस उम्दा ग़ज़ल के लिए दिली मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं !

Comment by राज़ नवादवी on September 11, 2012 at 10:40pm

शुक्रिया राजेश जी. आप ही मेरी पाठकों में से एक हैं, अच्छी लगती है आपकी पसंदगोई. आपका तहेदिल दिल से शुक्रिया. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 11, 2012 at 8:51pm

वाह उम्दा ग़ज़ल लिखी है राज जी दाद कबूल कीजिये |

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