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(१) फूटे बम चल जाए गोली,
नहीं निकलती मुँह से बोली |
बाहर आता खाने राशन,
क्या भई चूहा? नहिं रे "शासन" ||

(२) ताने घूँघट औ शरमाए,
तड़पा के मुखड़ा दिखलाए |
रोज दिखाए जलवा ताजा,
क्या मेरी भाभी? नहिं तेरा "राजा" ||

(३) चलते पूरी सरगर्मी से,
सुनते ताने बेशर्मी से |
बातों से पूरे बैरिस्टर,
क्या कोई लुक्खा? नहिं रे "मिनिस्टर" ||

(४) बातों से लगता है झक्खी,
नहीं भिनकने आती मक्खी |
डांटे मैडम बँधती घिग्गी,
क्या कोई पागल? नहिं रे "दिग्गी" ||

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Comment

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Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 16, 2012 at 7:25am

आदरणीय गुरुदेव...आपका स्नेह और विश्वास सर-आँखों पर.....आपकी बात से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ....आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.........


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 15, 2012 at 7:56pm

कह-मुकरियों पर भाई अजीतेन्दु आपकी पहली कोशिश अत्यंत ही भली लगी है. एक तो कह-मुकरी दूसरे हास्य !  लेकिन आपसे एक अनुरोध के साथ एक महत्त्वपूर्ण बात साझा कर रहा हूँ.

साहित्य हेतु समर्पित इस सात्विक मंच पर व्यक्तिगत आक्षेप (भले ही हास्यपरक) चाहे वह किसी तथाकथित राजानीतिबाज पर ही क्यों न हो उचित प्रतीत नहीं होता. हम व्यवस्था और वर्तमान देश-हाल पर असहज हो कर अपने भाव बेशक रख सकते हैं. किन्तु, व्यक्ति विशेष पर कोई सीधी रचना कंट्रोवर्सियल हो जाती है. मंच की प्रबन्धन टीम ने इस संदर्भ में पहले ही विचार कर लिया है.

आपके माध्यम से यह बात अन्य सभी रचनाकारों से साझा की जा रही है.

आपकी रचनाधर्मिता के प्रति पूर्ण आश्वस्ति है, भाई.   शुभ-शुभ !!

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 15, 2012 at 7:06pm

आदरणीया रेखा जी.........जिस देश का राजा संवेदनहीन हो जाए उस देश का कभी भला नहीं होनेवाला......ऊपर से उनके चमचे......बाप रे बाप........इन्हें और क्या कहा जाए........रचना को पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार.......

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 15, 2012 at 7:03pm

आदरणीया राजेश जी........दरअसल मेरी ये कह मुकरियाँ जनता की उस भावना को दिखा रही हैं जिसमें ऐसे लोगों के प्रति एक गुस्सा है......ये लोग खुद तो कुछ करते नहीं उल्टे कुछ करनेवालों की टाँग खींचते है......इन्हें और क्या कहा जाए........रचना को पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार.......

Comment by Rekha Joshi on September 14, 2012 at 11:54am

बातों से लगता है झक्खी,
नहीं भिनकने आती मक्खी |
डांटे मैडम बँधती घिग्गी,
क्या कोई पागल? नहिं रे "दिग्गी" ||,बहुत बढ़िया गौरव जी ,बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 14, 2012 at 10:54am

बातों से लगता है झक्खी,
नहीं भिनकने आती मक्खी |
डांटे मैडम बँधती घिग्गी,
क्या कोई पागल? नहिं रे "दिग्गी" || हाहाहा वाह वाह अजीतेंदु जी लगता है ओ बी ओ पर आचार संहिता लगवाओगे एनी वे बहुत बढ़िया रोचक ,सामयिक कह मुकरियाँ 

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