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भ्रष्टता के इस युग में
हर कोई समाज सुधारक है,
देखता है, विचारता है
समाज में व्याप्त घृणित बुराइयों को,
करता है प्रतिकार पुरजोर तरीके से
हर एक बुराई का,
लड़ता है सच के लिए,
बावजूद, क्यों अंत नहीं होता
किसी भी बुराई का,
बल्कि बढ़ती जा रही
बुराइयाँ, दिन-प्रतिदिन,
वजह मात्र एक,
हरेक मनुष्य सुधारता औरों को,
नहीं दिखती किसी को भी
कमियाँ अपनी,
करते नजरअंदाज
अपने अवगुणों को,
कैसे सुधरेगा समाज
जब सुधारनेवाले ही बिगड़े रहेंगे,
बढ़ानेवाले खुद पिछड़े रहेंगे,
धूल से धूल साफ नहीं होती,
कीचड़ से कीचड़ धोया नहीं जाता,
गन्दगी को हटाने के लिए
स्वच्छता की जरूरत होती है,
क्या वो स्वच्छता उपलब्ध है !

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Comment

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Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 16, 2012 at 7:27am

आदरणीय गुरुदेव........रचना को पसंद करने और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.........


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 15, 2012 at 8:00pm

धूल से धूल साफ नहीं होती,
कीचड़ से कीचड़ धोया नहीं जाता,
गन्दगी को हटाने के लिए
स्वच्छता की जरूरत होती है,

भाई अजीतेन्दुजी, आपके वैचारिक कथ्य बहुत ही सदृढ़ हैं.   हार्दिक बधाई स्वीकार करें ! 

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 15, 2012 at 6:53pm

आदरणीय अग्रज गणेश जी.......आपके द्वारा सराहना पाकर बहुत खुशी हुई.......आज के समय की मांग ही यही है की मनुष्य पहले खुद को देखे और उसके बाद ही औरों में दोष ढूंढें......प्रतिक्रिया देने के लिए आपका हार्दिक आभार........अनुज पर स्नेह बनाये रखियेगा........

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 15, 2012 at 6:48pm

आदरणीय लक्ष्मण सर....आपका कहना बिलकुल सही है....मैं भी यही कहना चाहता हूँ.......हर कोई औरों में बुराइयाँ देख लेता है पर खुद के अन्दर नहीं झांक पाता.....रचना को पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार.......

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 15, 2012 at 6:46pm

आदरणीया रेखा जी......आज वक्त की पुकार यही है........जो मनुष्य खुद को नहीं सुधार सका वो दुनिया को क्या सुधारेगा.......रचना को पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार.......

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 15, 2012 at 6:43pm

आदरणीया राजेश जी........रचना को पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार.....आज लोगों को सबसे पहले अपने अन्दर झाँकने की जरूरत है तभी सही मायने में वो देश और समाज के लिए कुछ कर सकता है.......


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 15, 2012 at 11:51am

//हरेक मनुष्य सुधारता औरों को,
नहीं दिखती किसी को भी
कमियाँ अपनी,//

बिलकुल सही कारण पकड़े है अनुज, हम सुधरेंगे जग सुधरेगा, इस वाक्य को जीवन में उतारना होगा, बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति, बहुत बहुत बधाई |

Comment by Rekha Joshi on September 14, 2012 at 11:47am

हरेक मनुष्य सुधारता औरों को,
नहीं दिखती किसी को भी
कमियाँ अपनी,
करते नजरअंदाज
अपने अवगुणों को,
कैसे सुधरेगा समाज,सुंदर रचना पर बधाई गौरव जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 14, 2012 at 11:42am

हर कोई समाज सुधारक है नहीं भाई अजितेंदु जी,   हाँ हर कोई अपने को समाज सुधारक समझता है वैसे ही जैसे हर कोई अपने आपको बुद्धिमान   आपकी ये पंक्तिया भाई जिसके लिए बधाई -

गन्दगी को हटाने के लिए

स्वच्छता की जरूरत होती है,  

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 14, 2012 at 10:47am

धूल से धूल साफ़ नहीं होती,
कीचड से कीचड धोया नहीं जाता,
गन्दगी को हटाने के लिए
स्वच्छता की जरूरत होती है,-----ये पंक्तियाँ ही सम्पूर्णता हैं रचना की बहुत गहन बात कही है   कुमार अजीतेंदु जी बहुत सुन्दर रचना हार्दिक बधाई 

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