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आस भरे मासूम नयन, क्यों मुझको हैं झकझोर रहे?
हो निराश क्यों विस्मित मन, तक आशा की यह डोर रहे?
*
मैं खुद बेबस पंछी हूँ,
नाज़ुक पर, कैद सलाखों में,
आखिर क्या विश्वास जगा,
पाऊँगी बेबस आँखों में ?
सपने थे जिन आँखों में, क्यों आँसू अब उन कोर रहे ?
आस भरे मासूम नयन, क्यों मुझको हैं झकझोर रहे?
*
कण्ट चुभन, हैं जख्मी तन,
मन भी होते घायल क्षण क्षण,
खुशबू थी जिन कलियों में,
क्यों बरसी उन पर घोर अगन ?
बदरी तम की छट जाए, कैसे उजली हर भोर रहे?
आस भरे मासूम नयन, क्यों मुझको हैं झकझोर रहे?
*
जिनको छूने हैं तारे,
जिनकी मंजिल है यह अम्बर,
उढने से पहले ही क्यों,
विच्छिन्न हुए हैं उनके पर?
नेहाँचल में झट ढक लूँ, जो आज हथेली छोर रहे,
आस भरे मासूम नयन, क्यों मुझको हैं झकझोर रहे?
*
अरमानों के पंछी की,
कहो कैसे उर्ध्व गति उभरे?
भ्रष्ट व्यवस्था के हाथों,
कैसे कोई जीवन सँवरे?
महिषासुर मर्दन कर दूँ, क्यों रक्त में एक हिलोर रहे?
आस भरे मासूम नयन, क्यों मुझको हैं झकझोर रहे?

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Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 6, 2012 at 12:21pm

आपका हार्दिक स्वागत है !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 6, 2012 at 11:58am

आदरणीय अम्बरीश जी, इस रचना के भावों को आपका अनुमोदन प्राप्त हुआ, इससे भावसम्प्रेषण को संबल मिला है. हार्दिक आभार.

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 6, 2012 at 11:26am

डॉ० प्राची जी,  मन के भावों को उद्घाटित करती हुई इस भावपूर्ण रचना के लिए सम्पूर्ण हृदय से बधाई स्वीकार करें !  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 25, 2012 at 7:52pm

इन शब्द भावों को सराहने हेतु आपका आभार आ. सतीश अग्निहोत्री जी 

Comment by Satish Agnihotri on September 25, 2012 at 4:22pm
अरमानों के पंछी की,
कहो कैसे उर्ध्व गति उभरे?
भ्रष्ट व्यवस्था के हाथों,
कैसे कोई जीवन सँवरे?.............Bahut khub

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 19, 2012 at 12:29pm

आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी, शब्द विशेष को सिंगल कोट में रखने का अर्थ मुझे मालूम नहीं था, इससे अवगत कराने हेतु आपका हार्दिक आभार. सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 15, 2012 at 9:41pm

डॉ. प्राची, कविताओं में इस तरह से किसी शब्द को प्रस्तुत करने का अर्थ उस शब्द के विशेष अर्थ की ओर इंगित करना होता है. चूँकि उस शब्द का ’वह’ अर्थ पाठकों की समझ से निकल सकता है अतः रचनाकार उसे सिंगल कोट में रखता है. अन्यथा सामान्य परिस्थितियों में ऐसा अमूमन नहीं किया जाता.

पुनः बधाइयाँ व हार्दिक शुभकामनाएँ.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 15, 2012 at 8:42pm

आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी,

सादर नमस्कार!
भावों की इस अभिव्यक्ति को कथ्य व शिल्प में आपके द्वारा सुगढ़ता का विशेषण मिलना अभिभूत कर रहा है. इस हेतु हार्दिक आभार.
 'तक' को विशेष रूप से इसलिए लिखा, क्योंकि मैं ताकने  के भाव और निगाहों की अपेक्षा को  emphasize करना चाहती थी, मुझे लगा कहीं ताक को तक लिखने के कारण इसको उच्चारित करने में, जल्दी से न बोल जाएं . मैं इस शब्द पर उच्चारण करते समय जोर देना चाहती थी.
क्या इस तरह लिखा जाना गलत है? कृपया बताएं . सादर.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 15, 2012 at 7:35pm

इस विशिष्ट रचना के लिये हार्दिक बधाई, डॉ. प्राची. जितना ही सुन्दर प्रयास उतना ही संतुष्टिदायी परिणाम. रचना में प्रतीत होती विवशता अत्यंत ही सुगढ़ तरीके से उभरी है.

शुभ-शुभ..

कृपया बताइयेगा कि हो निराश क्यों विस्मित मन, 'तक' आशा की यह डोर रहे  में तक  को विशेष रूप से सूचित क्यों किया गया है ?


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 14, 2012 at 9:38pm

आदरणीय गणेश बागी जी आपके सराहनात्मक शब्द हमेशा शाबाशी देते , हौसला बढ़ाते से महसूस होते हैं... इन अन्तः उद्गारों युक्त अभिव्यक्ति को सराहने हेतु हार्दिक आभार. सादर. 

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