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ये कहाँ हैं हम ?/गीत

खिलखिलाती सिसकियों का हर तरफ ही शोर है
भीड़ में तन्हाइयों की भीड़ चारों ओर है
ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

छू रहा मानव सफलता के चमकते नव शिखर
प्रकृत नियमों को विकृत करता ये कैसा है सफर
है सभी कुछ पर अधूरी,
हर निशा हर भोर है

ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

कितनी परतों में दबा है आज का ये आदमी
अब कहाँ किरदार सच्चे अनृत की है तह जमी
स्वार्थ आरी नेह बंधन,
कर रहीं कमज़ोर हैं

ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

है धुआँ आँखों में रिश्तों की सुलगती आह का
टूटते अनुबंधों का और टिमटिमाती चाह का
उच्चाकांक्षा की चमक में,
तिमिर ही घनघोर है

ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

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Comment

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Comment by seema agrawal on September 21, 2012 at 2:25pm

 रचना की सराहना के लिए शुक्रिया सतीश जी 

Comment by seema agrawal on September 21, 2012 at 2:24pm

राज़ जी किसी भी कविता को जिए बिना लिखना बहुत मुश्किल है लेखन में वो पल बहुत मुश्किल पल होते हैं जब बात कहने के लिए हम सही लफ्ज़ नहीं ढूँढ पाते .....और जब कविता बनने के बाद वो बहुतों को अपनी कहानी सी लगती है,या बहुतों को अपने मन की बात लगती है तो सारा श्रम सार्थक हो जाता है  ..........

//हम जब खुद से सवाल करने लगते हैं, बातें करने लगते हैं तो कविता सुन्दर बन जाती है. कोई खुद को हममें देखने लगता है//..........बहुत सुन्दर बात कही आपने ...शुक्रिया  

Comment by Satish Agnihotri on September 21, 2012 at 1:06pm

सुन्दर  एवं सराहनीय  रचना बधाई आपको ...इस चुने हुए शब्दों के लिए ....

Comment by राज़ नवादवी on September 21, 2012 at 1:00am

खिलखिलाती सिसकियों का हर तरफ ही शोर है 
भीड़ में तन्हाइयों की भीड़ चारों ओर है

ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

 

है धुआँ आँखों में रिश्तों की सुलगती आह का 
टूटते अनुबंधों का और टिमटिमाती चाह का

 

हम जब खुद से सवाल करने लगते हैं, बातें करने लगते हैं तो कविता सुन्दर बन जाती है. कोई खुद को हममें देखने लगता है......सुन्दर पंकतिया हैं. बधाई स्वीकार करें. 

 

Comment by seema agrawal on September 20, 2012 at 10:48pm

धन्यवाद सौरभ जी आपकी बात से सहमत हूँ ...........कुछ ऐसा भी  लिखा जाना चाहिए कुछ वैसा भी लिखा जाना चाहिए  

पुनः आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 19, 2012 at 2:42pm

कभी-कभी बातें सीधी-सीधी सुनने को मिले तो बहुत अच्छा लगता है. गीत का असर देर तक बना रहता है, सीमाजी.  हार्दिक बधाई.

Comment by seema agrawal on September 19, 2012 at 2:32pm

आदरणीय Laxman Prasad Ladiwala जी दिल से शुक्रिया आपको कि कथ्य से आप भी सहमत हैं 

Comment by seema agrawal on September 19, 2012 at 2:31pm

गीत की सराहना के लिए आभारी  हूँ गणेश जी धन्यवाद 

Comment by seema agrawal on September 19, 2012 at 2:30pm

धन्यवाद राजेश जी आपकी उपस्थिति भी दिल को छूती है 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 19, 2012 at 1:49pm
बहत सुन्दर गीत गहरे भाव -
भीड़ में तन्हाइयों की भीड़ चारों ओर है -    बहुत खूब  बधाई आदरणीया सीमा अग्रवाल जी 

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