For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ये कहाँ हैं हम ?/गीत

खिलखिलाती सिसकियों का हर तरफ ही शोर है
भीड़ में तन्हाइयों की भीड़ चारों ओर है
ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

छू रहा मानव सफलता के चमकते नव शिखर
प्रकृत नियमों को विकृत करता ये कैसा है सफर
है सभी कुछ पर अधूरी,
हर निशा हर भोर है

ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

कितनी परतों में दबा है आज का ये आदमी
अब कहाँ किरदार सच्चे अनृत की है तह जमी
स्वार्थ आरी नेह बंधन,
कर रहीं कमज़ोर हैं

ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

है धुआँ आँखों में रिश्तों की सुलगती आह का
टूटते अनुबंधों का और टिमटिमाती चाह का
उच्चाकांक्षा की चमक में,
तिमिर ही घनघोर है

ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

Views: 572

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by seema agrawal on September 21, 2012 at 2:25pm

 रचना की सराहना के लिए शुक्रिया सतीश जी 

Comment by seema agrawal on September 21, 2012 at 2:24pm

राज़ जी किसी भी कविता को जिए बिना लिखना बहुत मुश्किल है लेखन में वो पल बहुत मुश्किल पल होते हैं जब बात कहने के लिए हम सही लफ्ज़ नहीं ढूँढ पाते .....और जब कविता बनने के बाद वो बहुतों को अपनी कहानी सी लगती है,या बहुतों को अपने मन की बात लगती है तो सारा श्रम सार्थक हो जाता है  ..........

//हम जब खुद से सवाल करने लगते हैं, बातें करने लगते हैं तो कविता सुन्दर बन जाती है. कोई खुद को हममें देखने लगता है//..........बहुत सुन्दर बात कही आपने ...शुक्रिया  

Comment by Satish Agnihotri on September 21, 2012 at 1:06pm

सुन्दर  एवं सराहनीय  रचना बधाई आपको ...इस चुने हुए शब्दों के लिए ....

Comment by राज़ नवादवी on September 21, 2012 at 1:00am

खिलखिलाती सिसकियों का हर तरफ ही शोर है 
भीड़ में तन्हाइयों की भीड़ चारों ओर है

ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

 

है धुआँ आँखों में रिश्तों की सुलगती आह का 
टूटते अनुबंधों का और टिमटिमाती चाह का

 

हम जब खुद से सवाल करने लगते हैं, बातें करने लगते हैं तो कविता सुन्दर बन जाती है. कोई खुद को हममें देखने लगता है......सुन्दर पंकतिया हैं. बधाई स्वीकार करें. 

 

Comment by seema agrawal on September 20, 2012 at 10:48pm

धन्यवाद सौरभ जी आपकी बात से सहमत हूँ ...........कुछ ऐसा भी  लिखा जाना चाहिए कुछ वैसा भी लिखा जाना चाहिए  

पुनः आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 19, 2012 at 2:42pm

कभी-कभी बातें सीधी-सीधी सुनने को मिले तो बहुत अच्छा लगता है. गीत का असर देर तक बना रहता है, सीमाजी.  हार्दिक बधाई.

Comment by seema agrawal on September 19, 2012 at 2:32pm

आदरणीय Laxman Prasad Ladiwala जी दिल से शुक्रिया आपको कि कथ्य से आप भी सहमत हैं 

Comment by seema agrawal on September 19, 2012 at 2:31pm

गीत की सराहना के लिए आभारी  हूँ गणेश जी धन्यवाद 

Comment by seema agrawal on September 19, 2012 at 2:30pm

धन्यवाद राजेश जी आपकी उपस्थिति भी दिल को छूती है 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 19, 2012 at 1:49pm
बहत सुन्दर गीत गहरे भाव -
भीड़ में तन्हाइयों की भीड़ चारों ओर है -    बहुत खूब  बधाई आदरणीया सीमा अग्रवाल जी 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"प्रस्तुत रचना को रूपमाला छंद पर लिखा गया है। इस छंद के प्रयोग और विधान का जितना मुझे पता लग सका उसे…"
11 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"अंत या आरंभ  --------------- ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संतहो गया आरंभ जिसका, है अटल…"
11 hours ago
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा पंचक  . . . आरम्भ/अंत अंत सदा  आरम्भ का, देता कष्ट  अनेक ।हरती यही विडम्बना ,…"
12 hours ago
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा मुक्तक. . . . . आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख…"
12 hours ago
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सुशील जी। आप से मिली सराहना बह्त सुखदायक है। आपका हार्दिक आभार।"
20 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
Wednesday
Admin posted discussions
Tuesday
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175

 आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey posted a blog post

नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ

   जिस-जिस की सामर्थ्य रही है धौंस उसी की एक सदा से  एक कहावत रही चलन में भैंस उसीकी जिसकी लाठी…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आपने कहे को सस्वर किया इस हेतु धन्यवाद, आदरणीय  //*फिर को क्यों करने से "क्यों "…"
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना को आपने अनुमोदित कर मेरा उत्साहवर्धन किया, आदरणीय विजत निकोर जी हार्दिक आभार .. "
Tuesday
Sushil Sarna commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय जी सादर प्रणाम -  अद्भुत सृजन - हृदय तटों को छूती गहन भावों की अभिव्यक्ति ने अहसासों की…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service