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=====नज्म=====

तुम्हारी भीगी पलकें
याद हैं मुझे
भीगी पलकें
झरने सी छलकीं
पिरो न पाया था
एक मोती भी
और मेरे समन्दर-ए-दिल में
बाढ़ आ गयी

उठती मौजें
डुबोये देती थी
इश्क की खूबसूरत इमारत
ये लम्हा-ए-फुरकत था
या रोज-ए-महशर
शायद
वही था रूह कांप रही थी
जिस्म ठंडा सा
बेजान
बर्फाब सा

आँखें गर्म आब से
भरी भरी डबडबाई
याद है या
कोई जुस्तजू लिए
गुमराह सा सफ़र

वो नाजुक से लम्स
जिनमे नजाकत थी
कपास के फोहों सी
वो लम्स जो जगा देते थे
सोये हर एहसास को
रूह में उतार लेते थे
पल भर में
वो लम्स देर तक लबों पे
सुलगा देते थे
कपकपाती सर्द हवाओं को
अब वो यादों में
जगा देते हैं सारी रात
चुभते हैं खारों से

सदायें वो
सुनो न
जी उठती तमन्ना
एक बार फिर
बार बार जीने की
ग़ज़ल थी
या नज्म रूहानी सी
वो सदायें
जिसे सुन कर
जिन्दगी जन्नत हो जाती
और जन्नत
जन्नत तुम
अब तरसते हैं कान
सुनने वो सदा
मजबूर कर देते हैं
लिखने को वो हर्फ़
जो उड़ते हैं
सफाहों के इर्द गिर्द
पकडूँ वो तितली
जिनमे भरे हैं तुम्हारे रंग
रूकती ही नहीं
उड़ जाती है
खुशबू के जैसे

एहसासों की तपिश से
नर्म सी जर्ब से
तराशा था
मैंने पिघलते संग को
बनाया था सनम
लेकिन न पिघला सका
कोहे-मजबूरियों को
खड़े रहे वो
पत्थर से बंजर कोह
टूट गया
टकरा टकरा के
छूट गया साथ
तुम्हारा हमारा
पर याद रही
साए सी
हमेशा तकिये के गीलेपन में
बिस्तर में सलवटें लिए
करवटें बदलती
तुम्हारी खुशबू के साथ

संदीप पटेल "दीप"

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Comment

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on September 28, 2012 at 6:02pm

आदरणीय झा साहब सादर नमन
आपको नज्म के भाव भा गए
मेरा लिखना सफल हुआ
बहुत बहुत शुक्रिया आपका सादर आभार
स्नेह यूँ ही बनाये रखिये सादर 

Comment by राजेश 'मृदु' on September 28, 2012 at 12:53pm

अद्भुत भाव हैं इस रचना के, बहुत-बहुत बधाई

कृपया ध्यान दे...

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