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मैं शहर छोड़ आया उसका...

आज मैं शहर छोड़ आया उसका,
वो शहर जो हर पल मुझे,
बस याद उसकी दिलाता था,
वो शहर की जिसमें महकती थी,
बस उसी की खुशबू,
वो शहर जहां हर ओर उसके ही नगमे गूँजा करते थे,

वो वही शहर था जहां रहते थे,
बस चाहने वाले उसके,
आज भी बस शहर ही छूटा है उसका,
पर यादें अभी भी बाकी हैं किसी कोने में,
अपने इस नए शहर में भी बस,
उसकी ही परछाइयों कोई खोजता फिरता हूँ मैं,
बेशक शहर छोड़ दिया उसका मैंने,
पर इस नए शहर में भी मैं उसको ही खोजता हूँ,

बस शहर ही बदला है मैंने, अपना दिल नहीं बदला
वो उस शहर में नहीं इस दिल में रहा करती है...

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Comment by Dr.Prachi Singh on October 5, 2012 at 6:10pm

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति, हार्दिक बधाई पियूष पन्त जी.

Comment by seema agrawal on October 5, 2012 at 3:58pm

सच कहा  मूल स्थान छूटता है या कभी कभी छोड़ना पड़ता है  पर हम जहाँ भी जाएँ वहाँ की प्रिय स्मृतियाँ हमारी दिल में सदैव बसी रहती हैं 
सुन्दर प्रस्तुति पीयूष जी 

Comment by राजेश 'मृदु' on October 5, 2012 at 3:41pm

बिछड़े पल की कसक लिए बड़ी अच्‍छी रचना है, बधाई आपको

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 5, 2012 at 10:49am

अब इस नए शहर में तो मन नहीं लगता होगा उखडा उखडा रहता होगा  दिल तो उसी शहर के अन्दर जा रमड़ता होगा,

आपके कव्य से आपके कष्ट को समझा जा सकता है | काव्य के माध्यम से सन्देश हेतु बधाई |

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