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जिंदगी-मौत के बाद .

मैंने न जाना प्यार क्या है,
रिश्ता ऐ दर्द का अहसाह सा क्यूं है ?
साया-ऐ-दरख्तों पे पहुँच न सकी जो रौशनी,
उस रौशनी का इक अहसास सा क्यों है ?

ता उम्र ना खुल के मिल सकी जो सासें
उस प्राणवायु की कमी पे भी ये सांस क्यूं है ?
सूख चुके है जो धारे नदी से
फिर भी आज ये नयन नम से क्यूं है ?

ता उम्र ढूंढती रही जिस रौशनी को
उस सूरज का अहसास सा क्यों है.
जिंदगी तो जी के भी जी ना पाई ,
फिर भी, मौत के बाद इक -
जिंदगी का इन्तजार सा क्यूं है ??

रचित - द्बारा - डॉ नूतन गैरोला

ता उम्र ढूंढती रही जिस रौशनी को
उस सूरज का इन्तजार सा क्यों है

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Comment by ram shiromani pathak on April 5, 2013 at 1:23pm

 बेहतरीन कृति, बहुत बहुत बधाई आदरणीया नूतन जी,

Comment by Dr Nutan on November 8, 2010 at 7:39pm
@ राणा जी
@नवीन जी
@प्रीतम जी
@ गणेश जी

आपका शुक्रिया .. धन्यवाद |

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 26, 2010 at 5:13pm
स्वयम का मूल्यांकन करती एक बेहतरीन कृति, बहुत बहुत बधाई आदरणीया नूतन जी, आगे भी आपकी रचनाओं और टिप्पणियों का इन्तजार रहेगा |
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on October 25, 2010 at 11:48am
बढ़िया अभिव्यक्ति है अंतर्मन के पीड़ा की....बहुत ही शानदार प्रस्तुति नूतन दीदी....

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on October 22, 2010 at 7:08pm
अंतर्मन की पीड़ा की बेहतरीन अभिव्यक्ति|

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