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पिए रविकर विष खारा-

सकारात्मक पक्ष से, कभी नहीं हो पीर |
नकारात्मक छोड़िये, रखिये मन में धीर |

रखिये मन में धीर, जलधि-मन मंथन करके |
देह नहीं जल जाय, मिले घट अमृत भरके |

करलो प्यारे पान, पिए रविकर विष खारा |
हो जग का कल्याण, सही सिद्धांत सकारा ||

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Comment by रविकर on November 17, 2012 at 7:03am

आभार आदरणीय बागी जी , सौरभ सर , आदरणीय प्रदीप जी, आदरेया राजेश दी ।।

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 9, 2012 at 1:46pm

आदरणीय रविकर जी, सादर अभिवादन 

सकारात्मक पक्ष से, कभी नहीं हो पीर |
नकारात्मक छोड़िये, रखिये मन में धीर |

प्रेरणा दायक, सन्देश. 

बधाई. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 8, 2012 at 11:54pm

अनुमोदन हेतु धन्यवाद गणेश भाई.. .


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 8, 2012 at 11:44pm

प्रतिक्रिया कुंडली छंद आदरणीय सौरभ जी द्वारा भी बहुत अच्छी रची गई है, आपको भी बधाई |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 8, 2012 at 11:43pm

बहुत ही सामयिक कुण्डलिया छंद , बधाई आदरणीय रविकर जी |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 8, 2012 at 11:17pm

देख-समझकर कह रहे, भाई रविकर आज
कारण-मन दो रूप हैं, सोच समर्थित काज
सोच समर्थित काज, सकारा याकि नकारा
मन का अपना ढंग, जिये यह पारी-पारा
सुकर्म सम्मत धर्म, देह-सागर को मथकर
मिलता विष या अमृत, मगर लें देख-समझकर.. .

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 8, 2012 at 9:07pm

बहुत सुन्दर सामायिक सार्थक कुण्डलियाँ 

कृपया ध्यान दे...

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