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अमृत समान हे चाय मेरी, मै तुमको भूल न पाऊंगा

                                                                      

                                                                      

तुम शीतल, ग्रीष्म, उभय तापी;

तुम  बहुप्रकार, तुम  बहुरंगी !

हो  रंग, रूप  व  ताप  कोई,

पर थकित जनों की हो संगी !

हो जग के हित में तत्पर तुम, तुममे क्यों दोष बताऊंगा !

                                                      अमृत   समान  हे  चाय  मेरी, मै तुमको भूल न पाऊंगा !

 

लगभग  दुनिया  में  छाई  तुम,

इक  नाम  नया, कुछ रूप नया !

भारत  में   तो   पाया  तुमको,

जिस राज्य, नगर या गाँव गया !

हे विश्वव्यापिनी प्राणप्रिये, छोड़ तुम्हे कहाँ जाऊंगा ?

अमृत समान हे चाय मेरी, मै तुमको भूल न पाऊंगा !

 

इक  रूप  तुम्हारा  विकृत  सा,

जिसको  कि कहते काढ़ा लोग !

खांसी,   सर्दी   याकि   सरदर्द,

होते   इससे  खत्म  ये  रोग !

हे सुलभ औषधी जीवन की, क्योंकर तुमको बिसराऊंगा !

अमृत  समान  हे चाय मेरी, मै तुमको भूल न पाऊंगा !

 

पर  जग ये बड़ा कृतघ्नी है,

उपकार  नहीं   कोई माने !

कहता, करती तुम देह हानि,

दुर्गुण  तुममे  झूठ बखाने !

 पर  हे  सुस्वादे! मै मन से, सच गुण  तुम्हारे गाऊंगा !

 अमृत  समान  हे चाय मेरी, मै तुमको भूल न पाऊंगा !

                                                                                        -पियुष द्विवेदी ‘भारत’

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Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on November 17, 2012 at 12:22pm

धन्यवाद आदरणीय लक्ष्मण जी....... "जिससे मिलते हमको डालर, नखरे उसके सहने होंगे "........बिलकुल सही ! अभी मै चाय-विषयक अपने वर्णन से संतुष्ट नही हूँ, जल्दी-ही इसपर एक निबंध लिखने वाला हूँ !

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 16, 2012 at 6:34pm
अच्छी लगी, बधाई और देखे पियूष द्वेदी भाई -
अमृत समान है चाय हमारी, इसको भूल न पायेंगे 
सर दर्द दूर करे जो हामारा, उसको क्यों न सरायेंगे 
चाय पत्ती ही वह जड़ी बूंटी, बजरंगी जिसको लाये थे 
लक्ष्मण की मूर्छा जिसने हरली, उसे कैसे भूल पायेंगे
जिससे मिलते हमको डालर, नखरे उसके सहने होंगे 
अम्रत समान यह छे हमारी इसको भूल न पाएंगे  ।  
Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on November 16, 2012 at 3:56pm

सादर धन्यवाद आदरणीय प्राची दी.... चाय से मुझे वाकई में अजीब सा लगाव है, दिन-रात, जब, जितने कप मिले, कोई दिक्क्त नही, वरन आनंद है, जिसके लिए अक्सर माँ का विरोध(मेरी कम उम्र के कारण) भी सुनना पड़ता है, पर मै इसे वैसे ही मानता हूँ, जैसे दो प्रेमियों के बीच जमाना...!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 16, 2012 at 3:43pm

अभी चाय का कप हाथ में ही था जब आपकी इस रचना पर नज़र गयी.. एक तरफ चाय की चुस्कियां चलती गयीं और सामने स्क्रीन पर चाय का गुणगान रंग रूप बखान....वाह क्या खूब लिखा है 

हे विश्वव्यापिनी प्राणप्रिये, छोड़ तुम्हे कहाँ जाऊंगा ?

अमृत समान हे चाय मेरी, मै तुमको भूल न पाऊंगा !

चाय के कई शौक़ीन देखे, पर चाय के लिए एक सुमधुर गेय गीत समर्पित करने वाला चाय प्रेम देख कर आपकी संवेदनशील अभिव्यक्ति के लिए बस वाह वाह ही प्रेषित है.

हार्दिक बधाई इस चायांजलि के लिए आ. पियूष जी 

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