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जाने कब क्या हो जाये

इस ज़िंदगी के किस पल में

जाने कब क्या हो जाये |

मिल कर सारे जहाँ की ख़ुशी,

ज़िंदगी ही खो जाये |

 

खुशियों के दर्पण के पीछे,

हम दीवाने हो जाते हैं |

दीवानगी में ये ना सोचे,

अक्स ही हमें सुहाते हैं |

सुख के हर इक अक्षर को, दुःख जाने कब धो जाये |

 

सुख तो इक आज़ाद पंछी,

पिंजरे में न रह पायेगा |

दिल का सूना पिंजरा भरने,

दुःख ही फिर से आ जाएगा |

जाने कब गम का आंसू, दामन को भिगो जाये |

 

गुल नहीं सब बहार में,

कुछ कांटे भी खिलते हैं |

हर सुख के दिवास्वप्न में,

दुःख के बादल भी मिलते हैं |

कौन जाने कब ये सुख, अपने सपनों में सो जाये |

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Comment

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Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on November 26, 2012 at 10:07pm

राजेश कुमारी जी, आपको बहुत धन्यवाद| सुख और दुःख दोनों ही जीवन के पहलू हैं, सुख बहुत छोटा और दुःख बहुत बड़ा लगता है| 

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on November 26, 2012 at 10:05pm

आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी, आपका बहुत बहुत शुक्रिया, आपके विचार उत्तम हैं| "दुःख सहते सुख आ जायेगा " यही तो जीवन का सच है |

सादर 

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on November 26, 2012 at 10:03pm

डा. प्राची जी, पहले तो आपका बहुत बहुत धन्यवाद, आपकी सलाह के अनुसार इसे बदल दिया है| 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 26, 2012 at 8:40pm

जीवन के दोनों पहलुओं पर द्रष्टिपात करते भाव बढ़िया प्रस्तुति बधाई आपको 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 26, 2012 at 2:00pm
सुन्दर अभिव्यक्ति है ।बधाई । इसबारे में मेरे विचार -
दुःख ही सुख का साधन है 
दुःख सहते सुख आ जायेगा 
सुख तो केवल मर्ग तृष्णा,
जो मिले उससे अधिक लालसा 
सुख मरीचिका सा सरकता जायेगा 
इसीलिए यह सपनो में सो जाता ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 26, 2012 at 11:10am

बहुत सुन्दर वैचारिकता को  शब्द मिले हैं इस अभिव्यक्ति ..जाने कब क्या हो जाए में, इस हेतु हार्दिक बधाई आ. चंद्रेश कुमार जी 

खुशी तो इक आज़ाद पंछी,.............यहाँ खुशी को सुख करके देखिये 

पिंजरे में न रह पायेगा |

दिल का सूना पिंजरा भरने,

दुःख ही फिर से आ जाएगा |

सादर.

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