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हमारे इश्क का फैसला तो हमीं से होगा

न किसी खाप न किसी मौलवी से होगा
हमारे इश्क का फैसला तो हमीं से होगा

ये कह कर ठुकरा गया वो आसमाँ मुझे
हमारा वास्ता ही क्या तेरी जमीं से होगा

यूं दुआ को न तरस, यूं दवा को न ढूंढ
ज़ख्म इश्क ने दिया, ठीक शायरी से होगा

बेफिकर घूमता है, इश्क से अनछुआ
मुखातिब वो भी तो कभी दिल्लगी से होगा

यूं भी जिन्दगी किसी से बेताल्लुक नहीं होती
तेरा मिलना ही जरुर बुजदिली से होगा

मेरी ग़ुरबत पे कर कुछ निगाह कुछ करम
ये अंधेरों का मसला हल रौशनी से होगा

-पुष्यमित्र उपाध्याय

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Comment by Pushyamitra Upadhyay on December 7, 2012 at 7:25pm

सलाह पर जरुर अमल होगा खान सर, वीनस जी

Comment by वीनस केसरी on December 7, 2012 at 3:15am

सुन्दर प्रयास है
बधाई स्वीकारें

श्रेष्ठजन के कहे पर ध्यान दें साधते साधते सब कुछ सध जायेगा
 

Comment by MAHIMA SHREE on December 6, 2012 at 3:59pm

बेफिकर घूमता है, इश्क से अनछुआ
मुखातिब वो भी तो कभी दिल्लगी से होगा.......

मेरी ग़ुरबत पे कर कुछ निगाह कुछ करम
ये अंधेरों का मसला हल रौशनी से होगा...

सुंदर अभिवयक्ति .... बधाई स्वीकार करें

Comment by लतीफ़ ख़ान on December 6, 2012 at 12:45pm

जनाब पुष्यमित्र जी ,,,अच्छे ख्यालात के साथ उम्दा अशआर कहने के लिए मुबारक बाद ,,,, नाचीज़ का एक मशविरा अगर कुबूल हो तो,,,,काफ़िये पर ध्यान दीजिये ,,,मौलवी , शायरी , दिल्लगी ,रौशनी के साथ ,,हमीं, जमीं ,, ठीक नहीं लगा ...

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 6, 2012 at 11:45am

वाह मित्र वाह क्या बात है दिल को छूती ग़ज़ल खास कर ये दो शे'र तो बहुत ही शानदार हैं, दाद कुबूल कीजिये 
बेफिकर घूमता है, इश्क से अनछुआ
मुखातिब वो भी तो कभी दिल्लगी से होगा

मेरी ग़ुरबत पे कर कुछ निगाह कुछ करम
ये अंधेरों का मसला हल रौशनी से होगा

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