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लघुकथा: हराम-हलाल

मुझे थोड़ा बुरा तो लगा जब उसकी थाली में खाना परोसते वक़्त उसने मुझसे पूछा 
- ये चिकन किस दूकान से खरीदा था तुमने?
- वही पिकाडेली सर्कस स्टेशन के बाहर निकलते ही सीधे हाथ पर जो शॉप है ना, वहीं से
- ओत्तेरे की! यार मुझे कुछ वेज हो तो खाने को दे दो, वो स्साला गोरा हलाल मीट नहीं बेचता और तुम जानते ही हो कि मैं हराम नहीं खा सकता..
खैर कैसे भी मैंने जल्द-फल्द उसके लिए आलू-मटर की सब्जी तैयार कर दी थी। लेकिन अगले दिन जब ऑफिस में बॉस के गैरहाजिर होने पर उसे कम्प्युटर पर ताश का कोई गेम खेलते देखा तो पिछली रात को उसका बताया गया उसूल मैंने उसे याद दिला दिया। वो अगला-पिछला सब भूल हाथापाई पर कुछ यूं उतरा कि मेरी नज़र से उतर गया। तब से न वो मेरी सुनना पसंद करता है और न मैं उसे कुछ कहना।
दीपक मशाल

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Comment by Dr.Prachi Singh on December 12, 2012 at 11:44am

लोग अपनी नैतिकता की परिभाषाएं भी खुद बना लेते है.....

सुन्दर संदेशपरक लघु कथा पर बधाई स्वीकारें 

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on December 12, 2012 at 11:16am

ज्यादातर लोग आज ऐसे ही मिलेंगे....... बढ़िया कहानी....बधाई

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 12, 2012 at 10:34am

कथनी करनी में फर्क. 

कहीं हलाल और कही हराम 

वाह, बधाई. 

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