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अब हाथ उनका थाम लें

बचपन की देहरी लांघ कर
सच्चे हुए जज्बात जब
रस्ते जो थे अनजान तब
अब मंजिलों का नाम दें
अब हाथ उनका थाम लें .

जिनकी वजह जीवन मिला
इश्वर तुम्हारा शुक्रिया
अब कर्म की दुनिया में हम
अपना भी योगदान दें
अब हाथ उनका थाम लें

थोड़ी हंसी मासूम सी
मेरी वजह रंगीन सी
माँ से थी जिद्द थोड़ी सुलह
जीवन के मसले हल करें
अब हाथ उनका थाम लें.

सोचो जरा इस धरा का
सीने में कितने छेद हैं
रखती है सबको प्यार से
थोड़ा सा भी ना भेद है
अब माँ का कर्ज अदा करें
अब हाथ उनका थाम लें |

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Comment by vijay nikore on December 14, 2012 at 8:00pm

सोचो जरा इस धरा का
सीने में कितने छेद हैं
रखती है सबको प्यार से
थोड़ा सा भी ना भेद है
अब माँ का कर्ज अदा करें
अब हाथ उनका थाम लें |

सुमन जी, कितना अच्छा संदेश दिया है आपने!

काश इसे संसार में हर कोई सुने। बधाई!

विजय निकोर

 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 13, 2012 at 4:44pm

बहुत सुन्दर भाव भरी रचना पर बधाई आदरणीया सुमन जी


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 13, 2012 at 3:36pm

एक अनुरोध : कृपया हिंदी रचनाओं पर टिप्पणी और प्रतिउत्तर टिप्पणियों को अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से बचे ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 13, 2012 at 3:34pm

एक वैचारिक और संदेशपरक रचना की प्रस्तुति है सुमन जी, बहुत बहुत बधाई ।

Comment by SUMAN MISHRA on December 13, 2012 at 1:39pm

thanks a lot my respected friends

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 13, 2012 at 1:34pm

सुमन जी बेहद सुन्दर रचना बधाई स्वीकारें

Comment by Dr.Ajay Khare on December 13, 2012 at 1:32pm

bahut badia rachna badhai ki aap hakdaar he 

Comment by SUMAN MISHRA on December 13, 2012 at 12:05pm

thanks seema di

Comment by seema agrawal on December 13, 2012 at 11:00am

सोचो जरा इस धरा का
सीने में कितने छेद हैं
रखती है सबको प्यार से
थोड़ा सा भी ना भेद है
अब माँ का कर्ज अदा करें
अब हाथ उनका थाम लें |..........बहुत सुन्दर बात कही सुमन जी .......

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