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लघु कथा - कीमती पत्र,

तुम लड़की जात हो , तुम्हें अपने दायरे में रहना चाहिए, तुम अनवर की तरह नहीं हो वो तो लड़का है , उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा , लेकिन तुम्हारे साथ अगर कुछ उंच नीच हो गया तो हम सबका जीना मुहाल हो जाएगा,,,,ये सीख हमेशा गाँठ बाँध कर रखना.

रोज ही हिदायतों का पुलिंदा शबनम को बाँध कर थमाया जाता था, अब्बू तो दुबई चले गए दो साल पहले , बचे दादी, अम्मी और छोटा भाई अनवर. इस अनवर में छोटे भाई का कोई गुण नहीं है बस कॉलेज से आकर मेरी शिकायतों के पुल बांधना ही इसे आता है और उसी का खामियाजा रोज हिदायतों की टोकरी मुझे थमाई जाती हैं तंग आ गयी हूँ. पढने में भी मन नहीं लगता है . येही सोच सोच कर शबनम की आँखें भर आती थी, कॉलेज में अव्वल आने के बाद भी हिदायतों का इनाम ही मिला था उसे, मगर उसकी सोच की उड़ान जिसमे हौसले के पंख लगे थे वो बेख़ौफ़ उडे जा रहे थे, खुले आकाश में .
और आज कॉलेज का आखिरी दिन, एक बड़ा सा कप , मार्कशीट और चमकते हुए चेहरे के साथ उसका दहलीज से घर के अन्दर आना,,,,मगर अम्मी और दादी का चेहरा लटका देखकर अजीब सा मूड हो गया था उसका ...खैर दास्ताँ थी अब्बू की नौकरी छूट गयी है , अब उन्हें जल्द ही हिन्दुस्तान आना होगा, कुछ गलतियां हो गयी थी उनसे , खजांची के पद पर थे और कहीं पैसा गलत ट्रान्सफर हो गया जिसकी रवानगी नहीं हो पायी और उसी वजह से उन्हें वापस भेज रहे हैं,,,पूरे दिन बड़ी गमगीनी के साए में बीता मगर अनवर सीटियाँ बजता हुआ FM रेडियो पर गाने सुनता रहा..

सुबह की नमाज अता कर जैसे ही शबनम ने दूसरे कमरे का रुख किया पोस्टमैन एक पत्र थमा गया , देखते ही खुशी के आंसुओं ने उस पर लिखे शब्दों को धुंधला कर दिया, कॉलेज के अंतिम वर्ष की परीक्षा देते हुए उसने बैंक की परीक्षाएँ भी दी थी , परिणाम में सफल भी हो गयी थी ,जिसमे से एक बैंक की तरफ से अपॉइंटमेंट लैटर आया था ,और शबनम ने वापस वजू में अपने हाथों को जोड़ा और उस कीमती पत्र को लेकर माँ की तरफ बढ़ गयी....

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Comment by SUMAN MISHRA on January 5, 2013 at 11:13pm

कुछ तो अंतर खलता ही है
कोई कहता या ना कहता
येही रीत दुनिया की भैया
पुत्र हुआ तो वंश चलेगा,,,,,बहुत बहुत धन्यबाद ,,,श्री सौरभ जी , श्री अशोक जी...


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Comment by Saurabh Pandey on January 5, 2013 at 11:07am

परिवारों में बेटे और बेटियों के बीच जिस भेदभाव की बात यह लघु-कथा करती है और जिन प्रश्नों को सांकेतिक रूप से उठाती है उसके लिए कथाकार बधाई का पात्र है. ये अत्यंत महत्वपूर्ण विन्दुओं में से हैं जो आज समाज में समस्त विसंगतियों के कारण के मूल में हैं. पता भी नहीं चलता और एक पुरुष को प्रारंभ से ही यानि बालक (बेटे) के तौर पर ही यह भान हो जाता है कि वह अपनी सहोदरियों से श्रेष्ठ (?!) है. प्रारंभ से ही उसके मन में घर कर गयी यही श्रेष्ठता सामाजिक और पारिवारिक रूप से उसे इतना असंवेदनशील बना देती है कि प्रतिफल उसका रौद्र रूप कई-कई लहज़ों में बाहर आता है.

एक संवेदनशील और कथात्मकता के लिहाज़ से सतत कथा के लिए धन्यवाद व शुभकामनाएँ.

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 5, 2013 at 8:42am

सुन्दर लघु कथा, एक कदम पीछे नरक था आगे बढे स्वर्ग का द्वार खुला. लगन किसी के तारीफ़ कि मोहताज नहीं होती. बधाई स्वीकारें.

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