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मुझको क़फस में क़ैद रहने दीजिए

मुझको क़फस में क़ैद रहने दीजिए
अश्कों को मेरे यूँ ही बहने दीजिए

मेरे गुनाहों की तलाफी है यही
हर सितम चुपचाप सहने दीजिए

गुन्ग दीवारें फकत और कुछ नहीं
ना कीजिए आवाज, रहने दीजिए

महव-ए-गम हो जाओगे ऐ गम-गुसार
होठों को मेरे कुछ ना कहने दीजिए

किस बात के हो मुन्तज़र "विश्वास" तुम
ख़्वाबों को होकर ख़ाक ढहने दीजिए

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Praveen Verma 'ViswaS' on January 26, 2013 at 1:28pm

मेरी हौसला आफजाई के लिए आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया :-)

Comment by SUMAN MISHRA on January 24, 2013 at 6:21pm

praveen ji  bas apnee akaanchha se paripoorit kartee huyee kavita...jeevan me yehee to chahiye....

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 24, 2013 at 5:06pm

मेरे गुनाहों की तलाफी है यही
हर सितम चुपचाप सहने दीजिए

प्रवीन जी 

बहुत खूब 

सादर 

Comment by Yogi Saraswat on January 24, 2013 at 2:52pm

बहुत खूब ! 

मेरे गुनाहों की तलाफी है यही
हर सितम चुपचाप सहने दीजिए

गज़ब के अशार विश्वास जी

Comment by राजेश 'मृदु' on January 24, 2013 at 2:52pm

मधुरम्-मधुरम्

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