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कभी नहीं बन सकता

कभी नहीं बन सकता हूँ मै हरिश्चंद्र जी का अनुगामी
..कभी नहीं कर सकता हूँ मै प्रेम कृष्ण जैसा आयामी ||

कितने ही शब्दों को मैंने सच्चाई से डरते देखा
अपने ही भावों को अक्सर अंतर्मन में मरते देखा
दुःख की सर्द सुबह और रातें पीड़ा की गर्मी भरते हैं
आहों की स्वरलहरी दबकर आत्मपीड मंथन करते हैं

कल्पित दुनिया नहीं मिटा सकती है सच की सूनामी
..कभी नहीं कर सकता हूँ मै प्रेम कृष्ण जैसा आयामी ||

नहीं मिला है मुझे अभी तक दर्पण जैसा परम हितैषी
खोजे केवल मुझको मुझमे स्वार्थ रहित हो छाया जैसी
..ठगा हुआ व्यापारी हूँ मै मोल भाव की बाजारी का
भटका हुआ पुजारी हूँ मै प्रेम द्वार से गिरधारी का ||

रीत रिवाजों की दुनिया में कौन लिखेगा नयी कहानी
..कभी नहीं कर सकता हूँ मै प्रेम कृष्ण जैसा आयामी ||

माया के अंतर्द्वंदों से आन्दोलन जब भी करता हूँ
मार्ग भरा है कंटक वन से चलने से अब भी डरता हूँ
भक्ति भाव की सीमाओं पर दुनिया की लाचारी देखूं
पार करूँ भी तो कैसे मै अपनों की जब क्यारी देखूं

मानवता के अवशेषों से नहीं बदल सकती बदनामी
..कभी नहीं कर सकता हूँ मै प्रेम कृष्ण जैसा आयामी ||.............मनोज

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Comment by upasna siag on February 1, 2013 at 5:00pm

बहुत सुन्दर  अभिव्यक्ति ...

Comment by MAHIMA SHREE on January 31, 2013 at 9:08pm

कल्पित दुनिया नहीं मिटा सकती है सच की सूनामी
..कभी नहीं कर सकता हूँ मै प्रेम कृष्ण जैसा आयामी....

वाह बहुत ही सुंदर प्रस्तुति ..

हर पंक्ति हर शब्द बेजोड़ ... बधाई आपको

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 31, 2013 at 12:17pm

बहुत सुन्दर गीत मनोज जी 

नहीं मिला है मुझे अभी तक दर्पण जैसा परम हितैषी
खोजे केवल मुझको मुझमे स्वार्थ रहित हो छाया जैसी.................वाह बहुत सुन्दर भाव, आत्मविशवास 

रीत रिवाजों की दुनिया में कौन लिखेगा नयी कहानी.................बहुत सुन्दर भाव मुखरित हो उठे हैं 

माया के अंतर्द्वंदों से आन्दोलन जब भी करता हूँ 
मार्ग भरा है कंटक वन से चलने से अब भी डरता हूँ 
भक्ति भाव की सीमाओं पर दुनिया की लाचारी देखूं 
पार करूँ भी तो कैसे मै अपनों की जब क्यारी देखूं...................वाह !

इस सुन्दर भाव और चिंतन पगी रचना के लिए हार्दिक बधाई.

Comment by Manoj Nautiyal on January 30, 2013 at 10:30pm

bahut bahut aabhaar aapka SAURABH PANDAY JI , RAM SHIROMANI JI , VIJAY NIKORE JI 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 30, 2013 at 10:22pm

आपकी संभवतः कोई पहली रचना देख रहा हूँ भाई, बहुत सुन्दर प्रयास किय अहै आपने. 

इस पंक्ति को मैंने दिल से महसूस किया है - रीत रिवाजों की दुनिया में कौन लिखेगा नयी कहानी

बहुत खूब !

इन पंक्तियों के लिए बार-बार बधाई -

माया के अंतर्द्वंदों से आन्दोलन जब भी करता हूँ
मार्ग भरा है कंटक वन से चलने से अब भी डरता हूँ
भक्ति भाव की सीमाओं पर दुनिया की लाचारी देखूं
पार करूँ भी तो कैसे मै अपनों की जब क्यारी देखूं

शुभ-शुभ

Comment by ram shiromani pathak on January 30, 2013 at 9:38pm

सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई।

Comment by vijay nikore on January 30, 2013 at 4:45pm

सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई।

विजय निकोर

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