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वैलेंटाइन फ्लू (व्यंग)

 वैलेंटाइन  फ्लू (व्यंग)

त्राहिमाम  कर  रही  दिल्ली, फ़ैल  रहा  स्वाईंन फ्लू,
दूजे  सर  चढ़  के  बोल  रहा  सबके  वैलेंटाइन  फ्लू.
कही  मरीजों  की  है, कतारें  लम्बी  अस्पतालों  में,
और  हम  हैं  की  खोये  हैं  प्रेमिका  के  ख्यालों  में.
कही  परिजन  चीत्कार  कर  रहे  छाती पीटकर,
प्रेम  पत्र  लिख  रहे  हम  उसपर  इतर छिटकर.  
पड़ोस  में  एक  बीमार  पड़े  ,मदद  को हैं बुलाते,
पर  गुलाब  लिए  हाथ  में  हम  गीत हैं गुनगुनाते.
क्यों  औरों  का  दुःख  अपनाऊँ ,क्यों  सेवा  धर्म  करूँ,
मचले  जिससे  सुदर  बाला ,मैं  तो  ऐसा  कर्म  करूँ.
क्यों  समझू  की  परमार्थ  में  ही  छुपा  होता  प्यार,
तन  जिसमे  लुभाते  हों , मैं  करूँ  वही  व्यापार.
स्वाईंन  फ्लू  से  निपटने  का , क्यों  करूँ खोज या आविष्कार
कही  बेहतर  है  करूँ , किसी  लड़की  से  आँखे  चार

                                            प्रवीण "सागर"

                                           09311788846

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Comment by Mukul Kumar on February 13, 2013 at 9:57am

bahut khoob acchi racna hai

Comment by Dr.Ajay Khare on February 12, 2013 at 2:52pm

PRAVEEN JI SUNDER RACHNA BADHAI

Comment by mrs manjari pandey on February 12, 2013 at 12:16pm

 प्रवीण सागर जी वेलेंटाइन फ्लू आपके सर चढ़ कर बोल रहा है।मनोरंजक अच्छी रचना।

Comment by Abhinav Arun on February 11, 2013 at 9:58pm

अच्छा है और आमयिक भी हार्दिक बधाई इस व्यंग्य और त्यौहार पर भी !!

Comment by विजय मिश्र on February 11, 2013 at 11:27am

आज के अचेत  बबुआनों को बासंती झकझोर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 10, 2013 at 7:07pm

एक सार्थक सामयिक कटाक्ष बहुत खूब |

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