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कोई दीप फिर तुम जला दो प्रिये

पथ मेरे ये अंधेरों में घिरने लगे

कोई दीप फिर तुम जला दो प्रिये

आँख को अब ये नींदें सताने लगीं

चाह कोई गगन की जगा दो प्रिये

 

फिर बनो लक्ष्य मेरा पुकारो मुझे

भर के मुझमें उमंगें संवारो मुझे

मैं नदी बनके दौड़ा चला आऊं फिर

बनके सागर जरा तुम पुकारो मुझे

ऐसे ठहरा हुआ कैसे जी पाऊंगा

कोई चाँद फिर तुम मँगा लो प्रिये

पथ मेरे ये अंधेरों में घिरने लगे

कोई दीप फिर तुम जला दो प्रिये

 

 

मुझमें भर दो अगन यज्ञ हो जाऊँगा

तुम बनो प्रेरणा पथ बना लाऊंगा

तुम कुसुम बन के कोई निमंत्रण तो दो

मैं भ्रमर का सा निश्चय भी ले आऊंगा

बस तुम्हारे लिए जो थी मुझमें कभी

वही आग फिर अब लगा दो प्रिये

पथ मेरे ये अंधेरों में घिरने लगे

कोई दीप फिर तुम जला दो प्रिये

  -पुष्यमित्र उपाध्याय

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Comment

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Comment by Pushyamitra Upadhyay on February 14, 2013 at 9:07pm

उपासना दीदी.. बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Pushyamitra Upadhyay on February 14, 2013 at 9:06pm

आशीष जी, विजय सर ..आपका बहुत बहुत आभार

Comment by Pushyamitra Upadhyay on February 14, 2013 at 7:38pm

राजेश दीदी, प्राची दीदी छोटे भाई की ओर से सादर प्रणाम स्वीकार कीजिये

Comment by Pushyamitra Upadhyay on February 14, 2013 at 7:32pm

सौरभ सर आपको प्रणाम करता हूँ आशीष बनाये रखिये

Comment by Pushyamitra Upadhyay on February 14, 2013 at 7:31pm

संदीप भाई जी बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by upasna siag on February 14, 2013 at 6:35pm

बहुत सुन्दर ........

Comment by vijay nikore on February 14, 2013 at 9:29am

फिर बनो लक्ष्य मेरा पुकारो मुझे

भर के मुझमें उमंगें संवारो मुझे

मैं नदी बनके दौड़ा चला आऊं फिर

बनके सागर जरा तुम पुकारो मुझे

 

अनोखी अभिव्यक्ति के लिए ढेर बधाई।

विजय निकोर

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on February 13, 2013 at 11:25pm

सुन्दर रचना...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 13, 2013 at 8:26pm

प्रिय अनुज पुश्यमित्र उपाध्याय जी,

क्या अद्भुत लेखन है आपका, भाव जैसे ह्रदय की गहराई से बहे जा रहे हैं, बहे जा रहे हैं.. और क्या ही सुन्दर भाव हैं, हर अक्षर जैसे मोती.

बहुत बहुत बधाई इस अनमोल लेखन के लिए.

शुभेच्छाएँ.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 13, 2013 at 7:11pm

सुंदर दिल की गहराइयों से निकले भाव सुंदर रचना हेतु बधाई

कृपया ध्यान दे...

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