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कोई फूल अब थोडा खिलने तो दो

पत्थर दिलों के पिघलने तो दो
ज़रा होश अपने संभलने तो दो

सारा चमन तो जलाया है तुमने
कोई फूल अब थोडा खिलने तो दो

हर शाख पर अब तो उल्लू है बैठा  
कहीं इन परिंदों को मिलने तो दो

अंधेरों से डरते सभी हैं यहाँ पर
जरा तुम ये सूरज निकलने तो दो

ये आँखें ही कल की हकीकत रचेंगी
मगर आज ख्वाबों को पलने तो दो

-पुष्यमित्र उपाध्याय

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 16, 2013 at 6:49pm

//ये आँखें ही कल की हकीकत रचेंगी
मगर आज ख्वाबों को पलने तो दो//

क्या कहने भाई पुष्यमित्र जी , अच्छी ग़ज़ल कही है , बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Parveen Malik on February 16, 2013 at 12:46pm

सुन्दर भाव ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 15, 2013 at 5:29pm

पुष्यमित्रजी, आपके संप्रेषण में अद्भुत संभावनाएँ हैं. आप सहज हैं यह आपकी विशिष्टता है. विधाओं को आत्मसात करें, भाई.

आपसे बहुत कुछ सुने की हार्दिक अपेक्षा है.  शुभेच्छाएँ.

Comment by Dr.Ajay Khare on February 15, 2013 at 1:16pm

bahut sunder udgaar badhai ho upadhya ji

Comment by mrs manjari pandey on February 15, 2013 at 9:56am

कोई फूल थोड़ा  अब खिलने तो दो "    अच्चा लगा . बधाई।

Comment by vijay nikore on February 15, 2013 at 1:49am

ये आँखें ही कल की हकीकत रचेंगी
मगर आज ख्वाबों को पलने तो दो

 

अ्च्छे भाव पिरोए हैं ...  बधाई।

विजय निकोर

 

Comment by नादिर ख़ान on February 15, 2013 at 12:18am

पत्थर दिलों के पिघलने तो दो
ज़रा होश अपने संभलने तो दो

सारा चमन तो जलाया है तुमने
कोई फूल अब थोडा खिलने तो दो... बहुत उम्दा बात कही भाई उपाध्याय जी ....

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