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लक्ष्मी मेरे घर की .....-- मीना पाठक

आरती की थाली 
लिए हाथों में 
जाने कब से 
निहार रही हूँ बाट ....
आएगी वह 
जब सिमटी लाल-जोड़े में ,
मेहँदी रचे हाथों से 
दरवाज़े पर लगा कर 
हाथों के थाप ,
ढरकाती हुई अन्न का कलश
आलता लगे पैरों से
निशान बनाती करेगी 
प्रवेश मेरी बहू अन्नपूर्णा, 
मेरे घर में 
बन मेरे घर की लक्ष्मी ||

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Comment

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Comment by Meena Pathak on February 18, 2013 at 7:40pm

हार्दिक आभार आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी ... 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 18, 2013 at 7:14pm

बहु को घर की लक्ष्मी के रूप देखने की चाहना लिए बाँट जोहते देख बड़ी ख़ुशी हुई 

अगर सभी महिलाए दुसरे घर से आने वाली बेटी को घर की लक्ष्मी मान स्वगत 
को आतुर हो,उसे प्यार मिले तो तो क्लेश ही न रहे । सुन्दर भाव मीना पाठक जी 
Comment by Meena Pathak on February 18, 2013 at 6:50pm

आदरणीय राम शिरोमणि पाठक जी ..... आभार 

Comment by Meena Pathak on February 18, 2013 at 6:47pm

आदरणीय अभिनव जी .....आभार 

Comment by Abhinav Arun on February 18, 2013 at 6:39pm
सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का भाव चरितार्थ हुआ ,बधाई!
Comment by ram shiromani pathak on February 18, 2013 at 5:32pm

आदरणीया मीना जी ! अच्छे विचारो के साथ भाव भी उत्तम  है ..........

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