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(मौलिक और अप्रकाशित रचना)

शहरों की चकाचौंध में
फीके पङे गाँव-गुवाङ
नित नये फैशन तले
पिसता युवा समाज
पक्की चौङी सङकें यहाँ
सङकों पर रौशन लाइटें
गाङियों की चिल्ल पोँ में
खोयी घोङा-गाङी आज
ऊँचे-ऊँचे मकान बने हैं
नीचे उनके दुकान बनी हैं
गाँव पलायन करता रहता
शहरों की चकाचौंध में
नहीं जानता वो ये कि
कुछ नहीं ऐसा शहरों में
आकर्षण हो जिसके प्रति
सबसे ज्यादा होता प्रदूषण
शोर-सराबा शहरों में
शान्ति ढूँढते पार्कों में
सूर्य किरणों को तरसते
गमलों में पेङों का स्वांग रचाते
खुशी के लिए क्लब खंगालते
हथाई के लिए सैर करते
लोकल की धक्कामुक्की में
खो जाती पूरी जिन्दगी
पैदल चलने को नहीं समय
अकेलापन और चिङचिङापन
हरदम उनको घेरे रहता
घर और ऑफिस के बीच
खो गया खुला आसमान
ढंक लिया ऊँची इमारतों नें
घर का खुला आँगन
चौङी सङकोँ और गलियों में
वाहनों की लम्बी कतारें
शहर घूमता सङकों पर
न रात का पता ना दिन का
संवेदनाओं की बाट जोहता
शहर का ग्रामीण समाज
कच्ची बस्तियाँ घेरे रहती
शहर की खूबसूरती को
बाजारों की भीङभाङ में
खोया आज मनुष्य समाज
नहीं परवाह अपने परिवार की
उसको परवाह अपने पैसे की
बङा आदमी बनने को
खो देता वो मित्र-बन्धू
पैसों तक ही सीमित है उसका
आचार-व्यवहार रहन-सहन
दूषित वातावरण और भोजन से
लगती उसको नित नई बिमारियाँ
गरीब का कोई हाल ना पूछता
स्टेशन, नाली में वो पङा रहता
ग्रामीणों को कुछ ना समझे
शहर का सभ्य समाज
चमक-दमक में वो रहता हरदम
दिखावा करता रहता हरदम
गाँव भी खोये शहरों में
पढ-लिखकर शहरों में आवे
कुछ तो कुछ बन जाते
पर कुछ गुमनामी में खो जाते
जनसंख्या बढाए शहरों की
एक ग्रामीण देता शहरों को
प्रतिभा के साथ ही साथ
ग्रामीण परम्पराएँ भी।

- सतवीर वर्मा 'बिरकाळी'

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Comment

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Comment by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 13, 2013 at 5:04pm
आप सही कहते हैं आ॰ लक्ष्मण प्रसाद लङीवाला जी। गाँव से जो लोग शहरों की तरफ आते हैं हकीकत में वही लोग अपनी ग्रामीण परम्पराओं को जानबूझकर छोङते हैं। इन आने वालों में कुछ तो उत्पादकता का काम करते हैं लेकिन बाकी के लोग सिर्फ शहरों की आबादी बढाने के लिए ही आते हैं।
Comment by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 13, 2013 at 4:51pm
प्रोत्साहन से रचना सार्थक हुई आ॰ बृजेश कुमार सिंह जी।
Comment by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 13, 2013 at 4:49pm
टिप्पणी के लिए आभार आ॰ जवाहर लाल सिंह जी।
इस विकास में मानव की मौलिकता कहीँ नष्ट हो गयी है।
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 13, 2013 at 4:07pm

गाँव भी खोये शहरों में,पढ-लिखकर शहरों में आवे
कुछ तो कुछ बन जाते,पर कुछ गुमनामी में खो जाते
जनसंख्या बढाए शहरों की,एक ग्रामीण देता शहरों को
प्रतिभा के साथ ही साथ ग्रामीण परम्पराएँ भी।-  गाँव से शहर को पढने-लिखने के लिए, या रोजगार की तलाश में 

                                                            आने वाले भी शहर की आबादे बढ़त है, प्रदुषण में जीना सीखते है | 

ग्रामीण परम्पराए तो कुछ समय के लिए लाते है, फिर सब श्री रंग में रंग जाते है | समस्याए ही बढ़ती है | रचना के मद्ध्यम 

से सारी समस्याए उजागर करने के लिए बधाई 

Comment by बृजेश नीरज on March 13, 2013 at 7:21am

सही चित्र उकेरा है शहर का!

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on March 13, 2013 at 4:22am

यही तो विकास की परिणति है उसके आगे क्या होग?

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