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माथे पर सलवटें;

 

आसमान पर जैसे

बादल का टुकड़ा थम गया हो;

समुद्र में

लहरें चलते रूक गयीं हों,

 

कोई ख्याल आकर अटक गया।

 

धकियाने की कोशिश बेकार,

सिर झटकने से भी

निशान नहीं जाते।

 

सावन के बादलों की तरह

घुमड़कर अटक जाता है

वहीं

उसी जगह

उसी बिन्दु पर।

 

काफी वजनी है;

सिर भारी हो चला

आंखें थक गईं,

पलकें बोझल।

 

सहा नहीं जाता

इस विचार का वजन।

 

आदत नहीं रही

इतना बोझ उठाने की;

अब तो घर का राशन भी

भार में इतना नहीं होता कि

आदत बनी रहे।

 

बहुत देर तक अटका रहा;

वह कोई तनख्वाह तो नहीं

झट खतम हो जाए।

 

अभी भी अटका है वहीं

सिर को भारी करता।

बहुत देर से कुछ नहीं सोचा।

 

सोचते हैं भी कहां

सोचते तो क्यों अटकता।

 

इस न सोचने,

न बोलने के कारण ही

अटक गयी है जिंदगी।

 

तालाब में फेंकी गई पालीथीन की तरह

तैर रहा है विचार

दिमाग में

सोच की अवरूद्ध धारा में मंडराता।

 

अब मजबूर हूं सोचने को

कैसे बहे धारा अविरल

फिर न अटके

सिर बोझिल करने वाला

कोई विचार।

     - बृजेश नीरज

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Comment

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Comment by बृजेश नीरज on March 13, 2013 at 2:29pm

संदीप भाई आपका आभार!

Comment by बृजेश नीरज on March 13, 2013 at 2:28pm

आदरणीय विजय निकोर जी,
आपका हार्दिक आभार!
सादर!

Comment by बृजेश नीरज on March 13, 2013 at 2:27pm

आदरणीया प्राची बहन,

आपका आभार! आपकी हौसला अफज़ाई से लिखने का साहस बढ़ा!

 

Comment by बृजेश नीरज on March 13, 2013 at 2:24pm

भाई केवल प्रसाद जी आपका आभार!

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on March 13, 2013 at 10:47am

बहुत ही सुंदर रचना है
विचारों का यूँ अटकना और उसे उतनी ही सुंदरता से शब्द दे देना
वाह
बहुत बहुत बधाई आपको वाह आदरणीय वाह

Comment by vijay nikore on March 13, 2013 at 10:45am

आदरणीय बृजेश जी:

 

इन उत्कृष्ट भावों  के लिए आपको बधाई।

 

सादर और सस्नेह,

विजय निकोर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 13, 2013 at 10:35am

आदरणीय बृजेश कुमार जी
मस्तिष्क में यदि कोइ ऐसा विचार अटक जाए जिसके पार जाने का कोइ तरीका न सूझे , तब मन में उपजने  वाली बिलबिलाहट को सुन्दर अभिव्यक्ति मिली है ....

बहुत देर तक अटका रहा;

वह कोई तनख्वाह तो नहीं

झट खतम हो जाए ........ यह बिम्ब बहुत अच्छा लगा 


शुभकामनाएं

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 13, 2013 at 9:52am

माननीय श्री बृजेश कुमार सिंह जी, सुप्रभात! एक अच्छा चिन्तन और कशिश  को झकझोर देने वाली धारा प्रवाह कविता..वाह.वाह..! बहुत.बहुत बधाई..!

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