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अपनी गलती को प्रिये! मत समझो तुम भार।
दूध फटा तो क्या हुआ, कर पनीर तैयार॥

जीवन का उद्देश्य क्या, मिला हमें क्यों जन्म।
परमपिता को याद कर, करें निरन्तर कर्म॥

घृणा और पर डाह से, हो खुशियों का नाश।
प्रेम और सद्भाव से, मन में भरे प्रकाश॥

प्रेम और विश्वास हैं, दोनों एक समान।
जबरन ये न हो सके, चाहे जाये जान॥

दृश्य बदलते हैं प्रिये! बदलो अपनी दृष्टि।
निज नजरों के दोष से, दोषी दिखती सृष्टि॥

मेरी गलती भूलते, प्रतिदिन ही भगवान।
मैं भी प्रतिदिन भूलता, उनका हर अहसान॥

मेरी चिंता है जिसे, मुझको रखता याद।
वह ईश्वर कैसे मुझे, दे सकता अवसाद॥

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 16, 2013 at 8:10am

मेरी गलती भूलते, प्रतिदिन ही भगवान।
मैं भी प्रतिदिन भूलता, उनका हर अहसान॥

भगवान मानव की गलतियों भूला है, और मानव भवान के किये को ही भूलता दीखता है.  दोनों भूल एक कैसे हुई ???  यदि एक नहीं है तो फिर उपरोक्त दोहे के दूसरे विषम में ’भी’ क्यों आया है ?मैं भी प्रतिदिन भूलता    को क्यों मैं प्रतिदिन भूलता  किया जा सकता है न !?

एक बात :  पुनः निवेदन करूँगा कि आप रचना पोस्ट् करने की जल्दी में न रहें. रचना को कुछ दिन अपने पास रहने दें, सुधार होता रहेगा. जब आश्वस्त हो जायँ कि अब सुधार लगभग संभव नहीं तो ही रचनाएँ पोस्ट करें. 

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 14, 2013 at 6:37pm
भाई रामशिरोमणि जी! आपको दोहे पसंद आये रचना- कर्म सार्थक हुआ।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 14, 2013 at 6:36pm
आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी! आपसे आशीष पाकर मैं कृत्कृत्य हूँ।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 14, 2013 at 6:34pm
योगी सारस्वत जी! दोहों को पसंद करने क लिये हार्दिक आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 14, 2013 at 6:33pm
आदरणीया प्राची दीदी!दोहों की सराहना के लिये हार्दिक आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 14, 2013 at 6:32pm
आदरणीय वेदिका जी!दोहा पसंद करने के लिये हार्दिक आभार।
Comment by ram shiromani pathak on March 14, 2013 at 5:13pm

प्रेम और विश्वास हैं, दोनों एक समान।
जबरन ये न हो सके, चाहे जाये जान॥

मेरी गलती भूलते, प्रतिदिन ही भगवान।
मैं भी जाता भूल हूँ, उनका हर अहसान॥

सुन्दर दोहो के लिए बधाई श्री बिन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 14, 2013 at 2:21pm

दोहे मन को भाये, प्रेम और विश्वास का भाव लिए सुन्दर दोहो के लिए बधाई श्री बिन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी जी  

Comment by Yogi Saraswat on March 14, 2013 at 12:11pm

प्रेम और विश्वास हैं, दोनों एक समान।
जबरन ये न हो सके, चाहे जाये जान॥

दृश्य बदलते हैं प्रिये! बदलो अपनी दृष्टि।
निज

सुन्दर दोहे


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 14, 2013 at 10:42am

बहुत सुन्दर भावमय दोहावली प्रिय विन्ध्येश्वरी जी 

बहुत बहुत बधाई 

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