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ग़ज़ल-शख़्स जब वो इधर से गुजरा है

शख़्स जब वो इधर से गुजरा है
एक पत्थर जरूर पिघला है।


दिल मेरा बार-बार धडका है,
क्यूँ मुझे कोई डर सा रहता है।


मेरा महबूब मेरा इतना है,
ज़िन्दगी भर की कोई आशा है।


चाँदनी आज और बढ गई है,
चाँद पर कोई जाके बैठा है।


कौन समझा है इस सियासत को,
इस सियासत का राज़ गहरा है।


आदमी कपडे तो पहनता है,
जबकि इसका वज़ूद नंगा है।


रात सारी टहल-टहल कर वो,
अपनी खामोशियों से मिलता है।

  • सूबे सिंह सुजान

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Comment

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 14, 2013 at 10:37am

 आदरणीय  श्री सूबे सिंह सुजान जी,  ‘इक सियासत कोई क्या समझेगा, मौत खडी होगी पास वो गंगाजल मागेंगा‘ बहुत बहुत षुभकामनाएं   

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