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दीपावली दीप

दीपावलि की धवल पंक्तियाँ, देती आयीं सदा संदेशा I
छाया मिटे क्लेश कुंठा की, जीवन सुखमय रहे हमेशा I
छोटा बड़ा नहीं कोई भी, बीज साम्य के दीपक बोते I
इसी लिए हर घर के दीपक, केवल मिटटी के ही होते I

चाह यही यह दिव्य रश्मियाँ, हर मन को आलोड़ित करदें I
ये प्रकाश की मनहर किरणें, जीवन अंगना आलोकित कर देंI

रहे कामना यही ह्रदय में, मंगलमय हो हर जीवन I
प्रेम और सद्भाव बढायें, मिलकर सभी धनिक निर्धनI
देश प्रेम की प्रवल भावना, भरी रहे सबके मन में I
उर्जा और शक्ति विकसित हो, हर तरुणाई के तन में I

पुण्य पर्व की ज्योति शिखाएं, अशुभ सोच संशोधित कर दें I
ये प्रकाश की मनहर किरणें, जीवन अंगना आलोकित कर दें I

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Comment by Shriprakash shukla on November 19, 2010 at 2:15pm
आदरणीय मित्रवर ,
दीपावली दीप रचना आप को रुचिकर लगी,मेरा लिखना सार्थक हुआ .आप सब का आभारी हूँ
सादर
श्रीप्रकाश शुक्ल
Comment by आशीष यादव on November 19, 2010 at 9:08am
waah sir,
bahut shandar panktiya kahi gayi aapke dwara. aapne pichhle deepawali ke mahaivent me inhe nahi bheja, lekin yaha bhi inki khubsurti wahi hai. mujhe purn wishwash hai ki aap aane waale ivent me apni sakriy bhagidaari pesh karenge. aur bhi achchhi rachnaayen padhne ko milengi.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 18, 2010 at 10:04am
इसी लिए हर घर के दीपक, केवल मिटटी के ही होते I

वाह सर वाह, क्या बात कही है, हर घर के दीपक मिटटी के होते है , बहुत ही खुबसूरत अभिव्यक्ति, और शानदार प्रस्तुति हेतु बधाई आपको |
कुछ दिन पहले ही "OBO लाइव महा इवेंट" अंक -१ चल रहा था जिसका विषय दीपावली ही था, जो दस दिन तक चला, आपको जानकार प्रसन्नता होगी की सिर्फ १० दिनों मे एक विषय पर ४० से अधिक कवियों ने २०० सी अधिक रचनाओं सहित १२०० से भी अधिक Reply दिया, संभवतः यह किसी भी हिंदी साईट के लिये विश्व रिकार्ड हो | आप उक्त इवेंट को नीचे दिये लिंक पर पढ़ सकते है |
http://www.openbooksonline.com/forum/topics/obo-1-now-close

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