For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")


कारोलीन एक छोटा सा गाँव . यह उन्नीस सौ साठ की बात है . हमारे पड़ोस में एक औरत अपने
छः साल के बेटे के साथ रहने आयी . वह बहुत झगड़ालू थी . वह आये दिन किसी न किसी से लड़ाई करती रहती . वह जब भी किसीको निशाना बनाती अपने बेटे से कहती जाओ उसे पत्थर से
मारो . वह परित्यक्ता थी, अकेली थी , इसीलिये लोग कुछ नहीं कहते और उससे हर सम्भव दूरी बनाये रखते . लोगों की चुप्पी को वह कायरता समझ बैठी .
उसके घर के समीप एक बड़ा सा मैदान था . शाम के वक्त हम सभी गाँव के बच्चे उसमें खेलने जाते थे. उसका बेटा भी वहाँ आता था . वह बहुत ही उद्दण्ड था . एक तो हमारे खेल में अपनी टाँग अड़ाता. हम जब कुछ कहते तो अपनी माँ से हमारी शिकायत करता . वह हमें गाली देने लगती .
‘’ बड़े लोगों के छ्छूंदर बच्चे अभी मज़ा चखाती हूँ ‘’ वह पत्थर लेकर हमारे पीछे दौड़ती और अपने बेटे से भी कहती - ‘’ इन सबका सर फोड़ दो . ‘’ मेरा एक नन्हा सा दोस्त तो बुरी तरह से घायल
भी हो गया था . उस औरत ने इतना हंगामा किया जैसे कि हम लोग ही दोषी हों . इस घटना के बाद उस मैदान से हमारा नाता टूट गया. हम बहुत दुखी हुए . मन मसोस कर हम अपनी पढ़ाई में डूब गये .
समय अपनी चाल से चलता रहा . हम बड़े हो गये . अच्छी नौकरी करने लगे . वह औरत सीनियर सिटिज़ेन हो गयी . उसे ओल्ड एज का पेंशन मिलने लगा . उसका बेटा बेहद आलसी और आवारा
हो गया . शराब और गांजे की लत लग गयी . एक दिन लड़के ने अपनी माँ से पैसा माँगा . उसने
पैसे देने से इंकार कर दिया और बेटे से कहा – ‘’ क्या तुम अरखी के बने हो ? और लड़कों को देखो
कैसे काम करते हैं . अगर पैसा चाहिये तो जाओ तुम भी कुछ कमाओ . मैं तुम्हें एक फूटी कौड़ी नहीं
दूँगी .’’
लड़का था बहुत गुस्सैल . वह अनाप शनाप गाली बकता हुआ घर से बाहर निकल गया और एक बड़ा सा पत्थर उठाकर अपनी माँ के सर पर दे मारा . वह वहीं ढेर हो गयी .
---- कुंती
(मॉरिशस की एक सच्ची घटना पर आधारित. मौलिक व अप्रकाशित रचना)

Views: 428

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 18, 2013 at 8:24pm

कुछ अजीब सी अनुभूति हुई, इस रचना (लघुकथा) को पढ़ कर. मैं आदरणीय नादिर ख़ान साहब के कहे का अनुमोदन करता हूँ. जो हम बोते हैं वही काटते हैं.

सादर

Comment by नादिर ख़ान on April 18, 2013 at 12:01pm

इसिलिए तो कहावत है,बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय ..

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 11, 2013 at 12:51pm

मात पिता को अच्छी सीख देती रचना के लिए बधाई स्वीकरें आदरणीया सादर  

Comment by coontee mukerji on April 11, 2013 at 12:21am

लक्ष्मण जी ,सप्रेम नमस्कार . इंसान के जीवन में कभी कभी कुछ ऐसी घटनाएं घटती है जो आजीवन उसे याद रहता है . उन्ही घटनाओं

में से एक है .आपकी नज़र पड़ी इस केलिये बहुत बहुत धन्यवाद.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 10, 2013 at 4:29pm

बच्चे कि प्रथम गुरु माँ ही होती है, उसी कर उसपर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है | अगर माँ ने सही संस्कार नहीं दिए, तो बच्चे

कि गलतियों का खामियाजा एक दिन माँ बाप को ही भुगतना पड़ता है | "चोर को क्या चोर कि माँ को पकडो |" अच्छी 

लघु कथा, बधाई 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
2 hours ago
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Tuesday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Tuesday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service