मिसरों का वज़्न : २१२२ १२१२ २२ (११२२ १२१२ २२ की छूट ली जा सकती है)
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अच्छे अच्छों की जान लेता है
इश्क जब इम्तेहान लेता है
बात सबकी जो मान लेता है
छोड़ सबकुछ मसान लेता है
वही जीता है इस नगर में जो
बेचकर घर दुकान लेता है
फन वो देता है जिसको भी सच्चा
पहले उसका गुमान लेता है
ये निशानी है खोखलेपन की
खुद को खुद ही बखान लेता है
जब भी लगता है रोग पैसों का
सबसे पहले थकान लेता है
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(स्वरचित एवं अप्रकाशित)
Comment
शुक्रिया rajesh kumari जी, स्नेह बना रहे
शुक्रिया बृजेश कुमार सिंह जी
शुक्रिया अरुन शर्मा 'अनन्त' जी
बहुत बहुत धन्यवाद संदीप साहब
बहुत बहुत धन्यवाद विन्ध्येश्वरी जी,
बहुत बहुत धन्यवाद केवल साहब। यहाँ मेरा अर्थ था कि यदि आप सबकी बात मानकर कुछ खरीदने जायेंगे तो श्मशान ही खरीदना पड़ेगा इसलिए अपना दिमाग लगाना बहुत आवश्यक है। अर्थ आप तक नहीं पहुँचा इसके लिए क्षमा करें।
बहुत बहुत शुक्रिया बागी जी, मसान से मेरा अर्थ श्मसान ही है। इस विस्तृत टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद स्नेह बना रहे।
बढ़िया ग़ज़ल लिखी है धर्मेन्द्र जी दाद कबूलें
बहुत सुन्दर रचना!
मस्त मस्त मस्त मस्त भाई जी लाजवाब सुन्दर छोटी बहर में कहर बरपा दिया आपने, सभी के सभी अशआर लाजवाब है पर खास इनके वास्ते कुछ ज्यादा दाद कुबूल फरमाएं.
अच्छे अच्छों की जान लेता है .... वाह जी वाह क्या मतला हुआ है
इश्क जब इम्तेहान लेता है
ये निशानी है खोखलेपन की
खुद को खुद ही बखान लेता है
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