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हमने हर मौसम को आते जाते देखा है

हमने हर मौसम को आते जाते देखा है
हमको लेकिन सबने बस मुस्काते देखा है

झूठी बातें झूठे किस्से बतलाते हैं लोग
पत्थर को कब दर्पण से शरमाते देखा है

पर्दा रखना ठीक लगा हमको दुनिया में अब
फूलों पर जब भँवरों को मंडराते देखा है

कछुआ और खरगोश पुरानी बातें हैं यारो
अब गदहों को हमने मंजिल पाते देखा है

मंदिर मंदिर मिन्नत करके जिसको पाया था
उसको ही कल हमने आँख दिखाते देखा है

गाली देते फिरता था जो गुंडा राहों में
उसको ही अब अपना देश चलाते देखा है

घिस घिस खुदको कुंदन सा कर डाला है जिसने
उसकी चप्पल को हमने घिस जाते देखा है

कितने प्यासे आते हैं उसके साहिल पे पर
सागर को क्या उनकी प्यास बुझाते देखा है

इतराए थे तुम चढ़ के जो पहली सीढ़ी यूँ
उसके बाद ही तुमको लौट के आते देखा है

बाप बने हो जबसे चिंता में डूबे हो क्यूँ
तुमने किसकी अस्मत को लुट जाते देखा है ???

तुमने पन्नी फेंकी उसने बीन लिया उसको
बचपन से जिसको बस सपने खाते देखा है

उनको भरमाओ लेकिन बस इतना बतला दो
हमको कब सूरज को दीप दिखाते देखा है

संदीप पटेल “दीप”

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on April 15, 2013 at 10:15pm

गाली देते फिरता था जो गुंडा राहों में
उसको ही अब अपना देश चलाते देखा है.............वाह! क्या बात कही है.

बहुत सुन्दर गजल आदरणीय भाई संदीप जी.

Comment by vijay nikore on April 15, 2013 at 9:34pm

संदीप जी,

 

आपकी गज़ल पढ़ कर आनन्द आया। बहुत खूब!

बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 15, 2013 at 8:22pm

बहुत शानदार गज़ल कही है प्रिय संदीप जी 

हर एक शेर लाजवाब है ...  कौन से शेर बेहद पसंद आये कहना मुश्किल है, सभी बहुत अच्छे लगे 

कितने प्यासे आते हैं उसके साहिल पे पर
सागर को क्या उनकी प्यास बुझाते देखा है.....बहुत खूब!!

बाप बने हो जबसे चिंता में डूबे हो क्यूँ
तुमने किसकी अस्मत को लुट जाते देखा है ???..... उफ्फ!! बेटी के पिता की चिंता पर क्या शब्द लिखे हैं ..

हार्दिक दाद क़ुबूल कीजिये इस शानदार गज़ल पर.

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 15, 2013 at 5:42pm
फूलों से पर्दा उठा जालिम चमन वाले।
मैंने खुद तुझे तितली के पीछे आते देखा है॥
Comment by ram shiromani pathak on April 15, 2013 at 3:20pm

बाप बने हो जबसे चिंता में डूबे हो क्यूँ
तुमने किसकी अस्मत को लुट जाते देखा है ???///////सुन्दर

गाली देते फिरता था जो गुंडा राहों में
उसको ही अब अपना देश चलाते देखा है////ये लगा चौका 

बहुत सुन्दर आदरणीय पटेल जी  हार्दिक बधाई /////////

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 15, 2013 at 1:46pm

आदरणीय विनय भाई सादर
आपकी इस तरह सराहना पाकर मन प्रफुल्लित हो गया
इस हौसलाफजाई के लिए आपका बहुत बहुत आभार
स्नेह यूँ ही बनाए रखिए

आपके कहे को आगे बढ़ाता हूँ
नैसर्गिक प्रेम एक के साथ हो या जो दिख जाए सभी के साथ
मुझे फूल और भंवरे के प्रेम से आपत्ति नही है
मुझे भीड़ से आपत्ति है जो एक फूल पे ही मंडराते हैं यहाँ नैसर्गिक प्रेम की बात ही नही है

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 15, 2013 at 7:56am
भाई संदीप जी! बहुत ही शानदार गजल कही है आपने।कभी- कभी तो आपकी अभिव्यक्ति क्षमता से मुझे सौतिया डाह होने लगती है तो कभी इतना आनन्द आता है कि मन-चित्रलिखित सा रहा जाता है,शब्द ही नि:शेष हो जाते हैं।आपके ये शेर मुझे बेहद पसंद आये-
//झूठी बातें झूठे किस्से बतलाते हैं लोग
पत्थर को कब दर्पण से शरमाते देखा है//

सच पत्थर हृदय व्यक्ति कभी लज्जित हो ही नहीं सकता,क्योंकि उसने बेशर्मी का सख्त लबादा ओढ़ लिया है।

//पर्दा रखना ठीक लगा हमको दुनिया में अब
फूलों पर जब भँवरों को मंडराते देखा है//

नहीं भाई ये जुल्म नहीं,फूल और भौंरे का नैसर्गिक साहचर्य है।आपके इन पंक्तियों से असहमति में मेरी ये पंक्तियां-

"फूलों से पर्दा हटा जालिम चमन वाले।
मैंने खुद तितली के पीछे आते देखा है॥"

फिर भी मुरीद हूँ इसके नवापन पर।

//कछुआ और खरगोश पुरानी बातें हैं यारो
अब गदहों को हमने मंजिल पाते देखा है//

इसे क्या माना जाये तंत्र की बिडम्बना या उनकी लगन कुछ कन्फ्यूज सा हूँ।फिर भी बेहद पसंद आया।

//मंदिर मंदिर मिन्नत करके जिसको पाया था
उसको ही कल हमने आँख दिखाते देखा है//

मैं भी दो- चार होता हूँ इस समस्या से,शायद ये वैश्विक समस्या है।

//बाप बने हो जबसे चिंता में डूबे हो क्यूँ
तुमने किसकी अस्मत को लुट जाते देखा है ???//
कितना गम्भीर प्रश्न किया है आपने एक बेटी का बाप होना कितना चिंताजनक है।पहले केवल दहेज की चिंता सताया करती थी अब यह एक और चिंता उभर कर सामने आ गयी।अभी आज की खबर की दिल्ली में ही एक चार्टेड बस में 10 साल की लड़की से फिर रेप हुआ। क्या कहा जाये इस मौन मोहन व शीला को।
Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 14, 2013 at 9:31pm

आदरणीय लक्षमण सर जी सादर प्रणाम 

आपकी बधाई ह्रदय से स्वीकार करता हूँ 

सादर आभार आपका 

स्नेह यूँ ही बनाये रखिये 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 14, 2013 at 9:30pm

आदरणीया कल्पना जी सादर 

सराहना हेतु बहुत बहुत शुक्रिया आपका 

स्नेह यूँ ही बनाये रखिये 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 14, 2013 at 9:29pm

आदरणीय प्रदीप सर जी सादर प्रणाम 

ग़ज़ल को मान दे हौसलाफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया आपका 

स्नेह यूँ ही बनाये रखिये 

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