बह्र : रमल मुसम्मन सालिम
वक्त ने करवट बदल ली जो अँधेरा छा गया,
आसमां की सैर करने चाँद चलकर आ गया,
प्यार के इस खेल में मकसद छुपा कुछ और था,
बोल कर दो बोल मीठे जुल्म दिल पे ढा गया,
बाढ़ यूँ ख्वाबों की आई है जमीं पर नींद की,
चैन तक अपनी निगाहों का जमाना खा गया,
झूठ का बाज़ार है सच बोलना बेकार है,
झूठ की आदत पड़ी है झूठ मन को भा गया,
तालियों की गडगडाहट संग बाजी सीटियाँ,
देश का नेता हमारा यूँ शहद बरसा गया.....
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
Comment
आदरणीय विजय सर आपकी वाह एक सकारात्मक उर्जा है जो लेखनी को मिलती है. आशीष बनाये रखिये.
हार्दिक आभार आदरणीया उषा तनेजा जी
बहुत बहुत शुक्रिया राजेश जी, अखिलेश मिश्र जी, श्याम नारायण, केवल प्रसाद जी एवं दीपेन्द्र जी स्नेह बनाये रखिये.
हार्दिक आभार आदरणीय अशोक सर स्नेह यूँ ही बनाये रखिये.
बहुत बहुत शुक्रिया वीनस भाई ग़ज़ल पर आपकी टिपण्णी बहुत खास होती है, आपकी पारखी नज़र की तलाश हर ग़ज़ल पर रहती है. हार्दिक आभार आपका.
बहुत बहुत शुक्रिया अजय शर्मा जी
बहुत खूब अनंत भाई....गजल की कसावट बहुत बढ़िया है.....बधाई....
आ0 अरून जी, अतिसुन्दर । ’’वक्त ने करवट बदल ली जो अँधेरा छा गया, आसमां की सैर करने चाँद चलकर आ गया’’ बहुत बहुत बधाई स्वीकारे। सादर,
अरून जी,
//आसमां की सैर करने चाँद चलकर आ गया,//
वाह, वाह! अच्छी गज़ल के लिए दाद कबूल करें।
सादर,
विजय निकोर
बहुत बढ़िया ग़ज़ल के लिए बधाई!
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