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चांद सितारे

चुप से हैं।

रात

घनेरी छाई है।।

 

तेज घनी

दुपहरिया में

अब अंगार बरसते हैं।

तपती

बंजर धरती पर

पांव धरें

तो जलते हैं।

पेड़ की

टूटी शाख पर

इक कोंपल

मुरझाई है।।

 

चिटक गयीं

दीवारे भी

छत से

बूंद टपकती है।

जमीं

सहेजी थी मैंने

मुझसे

दूर खिसकती है।

नयनों की

परतें सूखी

दिल में

सीलन छाई है।।

 

देखो

अब आशाओं के

पंख झड़े

तन सूख गए।

कितने कितने

सपनों के

श्वास से

संग छूट गए।

बस

टूटा बिखरा सा ये

जीवन

इक भरपाई है।।

          - बृजेश नीरज

 

(मौलिक व अप्रकाषित)

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Comment

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Comment by बृजेश नीरज on July 9, 2013 at 8:11pm

आदरणीया गीतिका जी मेरी रचना पर आपकी उपस्थिति से मैं धन्य हुआ। आपको रचना पसंद आयी मेरा प्रयास सार्थक हुआ। आपका हार्दिक आभार!
सादर!

Comment by वेदिका on July 9, 2013 at 7:31pm

कितना खूब सूरत नवगीत लिखा आपने आदरणीय बृजेश जी! 

मैंने इस रचना को पहले नही देखा, इसलिए मै सबसे पहले माफ़ी मांग लेती हूँ, फिर बधाई देती हूँ आपको!   

//नयनों की परतें सूखी और दिल में सीलन छाई है//  ,,, क्या कहने, अद्भुत  कोम्बो प्रयोग!

// देखो अब आशाओं के पंख झड़े, तन सूख गये// ,,,, बहुत ही प्रभाव शाली पंक्ति ,, 

अति सुंदर नवगीत बना है!

आपको हार्दिक बधाई प्रेषित है!!    

 

Comment by बृजेश नीरज on June 3, 2013 at 8:01am

आदरणीय यतीन्द्र जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on June 3, 2013 at 7:59am

आदरणीय चिराग जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by yatindra pandey on June 3, 2013 at 12:13am

behad sundar rachna mere dil chu gayi

yatindra

Comment by Kedia Chhirag on May 17, 2013 at 5:42pm

निशब्द.......बहुत ही गहराई लिए हुए है ये रचना ...क्या कहूँ कुछ समझ नहीं आता ...किन्तु बेहद मर्मस्पर्शी .........

Comment by बृजेश नीरज on May 16, 2013 at 7:03pm

आदरणीय केवल भाई आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on May 15, 2013 at 10:12pm

आदरणीय रक्ताले साहब आपका हार्दिक आभार!

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 15, 2013 at 10:08pm

देखो

अब आशाओं के

पंख झड़े

तन सूख गए।

कितने कितने

सपनों के

श्वास से

संग छूट गए।

बस

टूटा बिखरा सा ये

जीवन

इक भरपाई है।।...........वाह! बहुत सुन्दर.

आदरणीय बृजेश जी सादर बहुत सुन्दर नवगीत रचा है सादर बधाई स्वीकार करें.

Comment by बृजेश नीरज on May 15, 2013 at 5:37pm

आदरणीय सौरभ जी
प्रथम तो आपका बहुत आभार! आभार कि आपने मेरे प्रयास को सराहा। आभार कि आपने मेरी सोच को दिशा दी।
कितने कितने आभार! शायद आपकी मेरी रचना पर टिप्पणी किसी आभार की सीमाओं को लांघकर आगे जा चुकी है जहां आभार व्यक्त नहीं किए जाते हैं दिल से सिर्फ महसूस किए जाते हैं। जहां आभार व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मिलते। मैं निःशब्द हूं। बस महसूस कर रहा हूं आपके कहे को।
अज्ञेंय का जिक्र और उनकी वह पंक्ति, उसके बाद आपकी रचना। किसी सपनों की दुनिया से सैर कर लौटा हूं।
अपनी इस रचना को मैंने अपनी भाव चेतना में लिखना प्रारम्भ किया और फिर अनायास न जाने कैसे फुटपाथ पर रहते लोग मेरे दिमाग में आ गए। वहीं रचना का अंत हो गया।
आदरणीय कल्पना रमानी जी और आपने जो दृष्टिकोण मेरी सोच को दिया है वह महत्वपूर्ण है और रचनाकार के रूप में विकास के लिए महत्वपूर्ण भी। उसे आत्मसात करने का प्रयास करूंगा।
एक बार फिर से आपका आभार!
सादर!

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