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कब तक बदहवास में
चलती रहोगी
एक ही धूरी से
एक ही रेखा पर
धागे भी टूट जाते हैं
सीधा खींचते रहने पर

अंधेरा नहीं है
तो पैर नहीं डगमगायेंगे
पर ये धूरी बदल रही है
सीधी ना होकर गोल हो गयी है
तुम्हारी चाल के अनुरुप
उसी दिशा में प्रत्यक्ष
तुम्हारी धूरी पर
बस मैं ही खडा हूँ ।
-दीप्ति शर्मा




मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 515

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Comment by Ashok Kumar Raktale on May 21, 2013 at 10:28pm

आदरणीया दीप्ति शर्मा जी सुन्दर रचना की है किन्तु कुछ ध्यान जरूर दिलाना चाहूँगा "कब तक बदहवास में चलती रहोगी.यहाँ में उचित  नहीं जान पड़ता.मात्रा गणना में कोई त्रुटी हो रही हो तो बदहवास सी किया  जा सकता है.सादर.

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on May 20, 2013 at 2:17pm

एक अच्छा प्रयास...........

Comment by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on May 16, 2013 at 6:51pm
बहुत सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकारें आ॰ दीप्ति शर्मा जी।
Comment by राज लाली बटाला on May 16, 2013 at 6:45pm

खूब है deepti sharma जी !! 

Comment by ram shiromani pathak on May 16, 2013 at 1:28pm

बहुत ही सुन्दर रचना हार्दिक बधाई आपको ///

निरंतर प्रयासरत रहिये

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