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क्यों मिल गयी संतुष्टि

उन्मुक्त उड़ान भरने की

जो रौंध देते हो पग में

उसे रोते , कराहते

फिर भी मूर्त बन

सहन करना मज़बूरी है

क्या कोई सह पाता है रौंदा जाना ???

वो हवा जो गिरा देती है

टहनियों से उन पत्तियों को

जो बिखर जाती हैं यहाँ वहाँ

और तुम्हारे द्वारा रौंधा जाना

स्वीकार नहीं उन्हें

तकलीफ होती है

क्या खुश होता है कोई

रौंधे जाने से ??

शायद नहीं

बस सहती हैं और

वो तल्लीनता तुम्हारी

ओह याद नहीं अब तुम्हें

भेदती है अब वो छुअन

जो कभी मदमुग्ध करती

तुम्हारी ऊब से खुद को निकालती

अब प्रतीक्षा - रत हैं वो

खुद को पहचाने जाने का

टूटकर भी

खुशहाल जीवन बिताने का

क्या जीने दोगे तुम उन्हें

उस छत के नीचे अधिकार से

उनके स्वाभिमान से

या रौंधते रहोगे हमेशा !!!

अपने अहंकार से

इस पुरुषवादी समाज में

आखिर कब मिल पायेगी

उन्हें उन्मुक्तता ???

- दीप्ति शर्मा

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by यशोदा दिग्विजय अग्रवाल on May 6, 2013 at 10:17am

क्या..


मिल जायेगी

उन्हें उन्मुक्तता ???

शायद...

यदि हाँ...

तो कब तक

होगी उन्मुक्त

आज की नारी

सादर......

Comment by deepti sharma on February 16, 2013 at 6:50pm

आदरणीय  लक्ष्मन जी .....आदरणीय  अजय जी ...आदरणीया नीलिमा जी ... बहुत आभार .. यूँ ही मार्गदर्शन करते रहें 

Comment by deepti sharma on February 16, 2013 at 6:48pm

आदरणीय दिनेश जी  .. आदरणीय राजेंद्र जी .. आदरणीया उपासना जी ... बहुत आभार .. यूँ ही मार्गदर्शन करते रहें 

Comment by deepti sharma on February 16, 2013 at 6:46pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी ...आदरणीय विजिय निकोर जी ...आदरणीय गणेश बागी जी ..  बहुत आभार .. यूँ ही मार्गदर्शन करते रहें 

Comment by deepti sharma on February 16, 2013 at 6:41pm

आदरणीय सौरभ जी ,  मैं इस कविता को और बेहतर लिखने की कोशिश करूँगी  आपको आप यूँ ही मार्गदर्शन करते रहें आभार ..

Comment by Neelima Sharma Nivia on February 15, 2013 at 7:14pm

 सुन्दर  प्रस्तुति 

Comment by Dr.Ajay Khare on February 15, 2013 at 11:30am

touching having deep feel badhai 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 15, 2013 at 11:30am

रोंदा जाना कतई स्वीकार नहीं हो सकता । भारत की पुरातन वेद पुराण इस प्रकार की इजाजत भी 

नहीं देते,यह तो मध्युगीन आई विक्रति का परिणाम है, जिसे दूर करने के लिए महिलाओं को जागरूक
करना होगा, इस द्रष्टि से यह रचना सुंदर है।सवेदनशील सुन्दर रचना के लिए बधाई दीप्ति शर्मा जी ।
Comment by upasna siag on February 14, 2013 at 6:16pm

बेहद संवेदन शील रचना दीप्ति जी ....

Comment by राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी' on February 14, 2013 at 11:39am

दीप्ति जी बहुत ही बहुत बड़ी संवेदना के साथ आपके शव्दों में जो आधुनिक की ये अठखेलियाँ नजर आती है वास्तव में ये सोचनीय विषय बनता जा रहा है बहुत उत्कृष्टता के साथ उकेरा है आप ने इस मन में उठते हुए इन कुंठित होते हुए भावों को 

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