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एक नवगीत--सूर्य देवा...

सूर्य देवा, लाँघना कुछ सोचकर,

इस गाँव की चौखट। 

 

बढ़ रहे तेवर तुम्हारे,

सिर चढ़े वैसाख में।

भू हुई बंजर चला जल,

भाप बन आकाश में।

देव! है स्वागत तुम्हारा,

ध्यान हो लेकिन हमारा,

बाँध लेना प्रथम अपनी आग सी,

किरणों की बिखरी लट।

 

मौन हैं प्यासे दुधारू 

खूँटियों से द्वंद है।

हलक सूखे हैं, नज़र में

याचना की गंध है।

शेष जल यदि तुम निगल लो,

गागरी उदरस्थ कर लो,

अन्नपूर्णा किस तरह झेले भला,

तन सोखता संकट।

 

ले गए लोलुप हमारी,

शहर नदिया मोड़कर।

तन यहाँ तर स्वेद से,

जल से हैं तर वे बेखबर। 

तुम सखा यह याद रखना,

गाँव में शुभ पाँव धरना,

सुर्ख मुख पर बादलों का ओढ़कर,

बस हाथ भर घूँघट।

 

मौलिक व अप्रकाशित

 

कल्पना रामानी

Views: 640

Comment

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Comment by कल्पना रामानी on May 22, 2013 at 6:03pm

राजेश जी, आपकी आत्मीय टिप्पणी से अपार हर्ष हुआ। हार्दिक धन्यवाद...

 

Comment by राजेश 'मृदु' on May 22, 2013 at 2:46pm

वाह-वाह कल्‍पनादी, शानदार नवगीत लिखा है

मौन हैं प्यासे दुधारू 

खूँटियों से द्वंद है।

हलक सूखे हैं, नज़र में

याचना की गंध है।

कितना सुंदर चित्र खींचा है...... पंक्ति दर पंक्ति वाह अनायास मुंह से निकल जाता है, सादर

Comment by Abhinav Arun on May 22, 2013 at 9:33am

तुम सखा यह याद रखना,

गाँव में शुभ पाँव धरना,

सुर्ख मुख पर बादलों का ओढ़कर,

बस हाथ भर घूँघट।

क्या कहने आदरणीय कल्पना जी , सभ्यता और संस्कारों की सीख देती और उसमे पोषित रचना बहुत खूबसूरत और सशक्त बन पड़ी है हार्दिक बधाई आपको !

Comment by राज लाली बटाला on May 21, 2013 at 9:03pm

खूब  कल्पना जी

सूर्य देवा, लाँघना कुछ सोचकर,

इस गाँव की चौखट। 

Comment by POOJA AGARWAL on May 21, 2013 at 8:58pm

अदभुद रचना ..सादर प्रणाम !

Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on May 21, 2013 at 5:55pm

वाह वाह वाह कल्पना जी आप अद्भुत हैं विलक्षण हैं अभिभूत हूँ आपकी यह रचना पढ़ के.......बहुत बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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