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बस इतनी सी ख़ता हमारी

बस इतनी थी

खता हमारी

कि थोड़ा

जीना चाहा

कॉफी के

हर घूंट में हमने

कितना कुछ

पीना चाहा

मगर बेहया

इन रातों को

इतना भी

मंजूर न था

पलट हंसा

सारे प्रश्‍नों को

जब उत्‍तर कुछ

दूर ना था

और छपे तब

कितने किस्‍से

चेहरे के

अखबार में

समझ चुका था

गहन दहन ही

मिलता इस

संसार में

बस इतनी थी

ख़ता हमारी

कि थोड़ा

खिलना चाहा

स्‍ट्रेचर पर

पड़े समय से

बिना झिझक

मिलना चाहा

(सर्वथा मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on May 26, 2013 at 7:53am

आदरणीय राजेश जी सादर, सुन्दर भावपूर्ण रचना, सादर बधाई स्वीकारें.

Comment by Meena Pathak on May 23, 2013 at 6:44pm

बस इतनी थी

ख़ता हमारी

कि थोड़ा

खिलना चाहा

स्‍ट्रेचर पर

पड़े समय से

बिना झिझक

मिलना चाहा..........................इस सुन्दर कविता के लिए बधाई स्वीकारें आ.राजेश जी 

Comment by बृजेश नीरज on May 22, 2013 at 9:29pm

सुंदर कविता है। बधाई आपको!

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 22, 2013 at 5:57pm

बस इतनी थी ख़ता हमारी

कि थोड़ा

खिलना चाहा स्‍ट्रेचर पर

पड़े समय से

बिना झिझक मिलना चाहा -मन के भाव बड़ी सुन्दरता से उकेरे है | हार्दिक बधाई श्री राजेश कुमार झा साहिब 

Comment by Abhinav Arun on May 22, 2013 at 9:31am

वाह राजेश जी कविता अच्छी लगी बधाई आपक्को !

Comment by राज लाली बटाला on May 21, 2013 at 9:01pm

Khoob hai Rajesh Kumar Jha ji 

Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on May 21, 2013 at 5:51pm

बहुत अच्छी रचना है बन्धु भाव पक्ष प्रबल है 

कृपया ध्यान दे...

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