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ग़ज़ल - मेरे मन को भाता बस्तर !

ग़ज़ल - 

नहीं युधिष्ठिर एक यहाँ पर । 
यक्ष छिपे हर तरफ बहत्तर ।

क्यों बैठा सीढी पर थककर ,
चल कबीर चौरा के मठ पर ।

साखी शबद सवैया गा तू ,
लोभ छोड़ अब चल दे मगहर ।

रिश्ते सारे स्वार्थ के धागे ,
झूठे हैं नातों के लश्कर ।

तुम गुडगावां के गुण गाओ ,
मेरे मन को भाता बस्तर ।

सेवक कोई रहा नहीं अब ,
सबके भीतर बैठा अफसर ।

ज्ञान की पगड़ी सर पर भारी ,
मगर ज़ुबाने जैसे नश्तर ।

            - अभिनव अरुण 

               [01022013]

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Comment

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Comment by Vinita Shukla on July 23, 2013 at 9:37pm

"क्यों बैठा सीढी पर थककर ,
चल कबीर चौरा के मठ पर ।" सुंदर और प्रभावी अभिव्यक्ति. बधाई.

Comment by Abhinav Arun on June 4, 2013 at 2:53pm

और हाँ  आपके कहने के बाद अब गाफ़ का  अर्थ जान गया हूँ ..बहुत साधुवाद आपका !!

Comment by Abhinav Arun on June 4, 2013 at 2:52pm

सादर प्रणाम आदरणीय !! शुभ शुभ !!!!!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 3, 2013 at 10:48pm

//बताने वाले कम मिलते हैं ..मुश्किल से बताते हैं .. यहाँ वीनस जी के कक्षा को  जहां सहज सुलभ जानकारी है .. और संशय दूर करने को आप जैसे मान्यवर ..सो भला है ..वैसे मैं जिस फील्ड में हूँ रेडिओ में मेरा अनुभव कुछ ऐसा रहा है की मैं भी अब सीखाने से दूर ही रहता हूँ//

राउर अब ई कुल्हि कहला प हम का कहीं,  भाईजी ? जे, हमनी दूनो जाना ओबीओ प के अब सबसे पुरान सदस्यन में से बानी जा, ओह ओबीओ प जहवाँ के उदेसवे आजु ले सीखल-सिखावल रहल बा.. आ रही .. 

जय-जय

Comment by Abhinav Arun on June 3, 2013 at 9:26pm

अब अगर कहूं तो आप मानेंगे नहीं ..तक्तीह जिसे आप सब कहते हैं वह अब जाकर सीख सका हूँ ...
 कुछ दिन पहले तकबुले रदीफ़ जाना है उसे ठीक किया है .. अब आपने बताया तो गाफ़ भी पूछ जान लूँगा ... बताने वाले कम मिलते हैं ..मुश्किल से बताते हैं .. यहाँ वीनस जी के कक्षा को  जहां सहज सुलभ जानकारी है .. और संशय दूर करने को आप जैसे मान्यवर ..सो भला है ..वैसे मैं जिस फील्ड में हूँ रेडिओ में मेरा अनुभव कुछ ऐसा रहा है की मैं भी अब सीखाने से दूर ही रहता हूँ .. tippni men कुछ मात्रा  की त्रुटियाँ हो रही हैं यह संज्ञान में हैं ..

इस ग़ज़ल पर परिश्रम कम हुआ है मानता हूँ पर आपने स्नेह लुटाया यह मेरा सौभाग्य है .सादर प्रणाम !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 1, 2013 at 11:47pm

वाह .. . इस क़ामयाब कोशिश पर बधाई, भाईजी

तुम गुडगावां के गुण गाओ ,
मेरे मन को भाता बस्तर ।

सेवक कोई रहा नहीं अब ,
सबके भीतर बैठा अफसर ।

ज्ञान की पगड़ी सर पर भारी ,
मगर ज़ुबाने जैसे नश्तर ।

उपरोक्त इन तीन अश’आर ने तो जैसे मुग्ध कर दिया.  बहुत-बहुत शुक्रिया.

आपने आठ यानि सम ग़ाफ़ लेकर मिसरे क्यों बनाये ? कोई विशेष कारण ?

वैसे ग़ज़ल शानदार जानदार है.

Comment by Abhinav Arun on May 29, 2013 at 9:15am

प्रियंका जी शेर पसंद आया लिखना सार्थक हुआ बहुत शुक्रिया आदरणीय। !

Comment by Abhinav Arun on May 29, 2013 at 9:14am

बहुत आभार संजय जी और इस शेर के लिए मुबारकवाद क्या सटीक कहा है !!

Comment by Priyanka singh on May 29, 2013 at 12:34am

ज्ञान की पगड़ी सर पर भारी ,
मगर ज़ुबाने जैसे नश्तर.......सुन्दर बहुत बढ़िया .....बधाई सर 

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on May 28, 2013 at 7:01pm

बहुत खूब आ अभिनव अरुण जी... बधाई स्वीकारें...

हरा भरा था लाल हुआ है,

चीख रहा है मेरा बस्तर.

सादर...

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