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हर रूप में हर रंग में

हर रूप में हर रंग में,

कभी दूर से कभी संग में

अकेले कमरा-बंद में ,

कभी भीड़ के हडकंप में

 

तपते आँगन में नंगे पाँव से,

कभी पीपल की ठंडी छांव से

हकीक़त कि कम्पित नाव से,

कभी सपनों के रेशमी गांव से

 

नदिया कि बहती धार पे,

कभी क्षितिज के उस पार पे

पेड़ों कि हिलती डार पे,

कभी वीणा कि झंकृत तार पे

 

दूर चाँद के मुस्कुराने पर,

कभी दिन में आंसू बहाने पर

फूलों के खिलखिलाने पर,

कभी उम्मीदें टूट जाने पर

 

डबडबाई आँखें छिपाते हुये,

कभी खुलकर ठहाके लगाते हुये

सँभलते-लड़खड़ाते हुये,

कभी रागिनी गुनगुनाते हुये

 

जीवन के झिलमिल कोणों को,

इस राह के अगणित मोड़ों को

लम्हों के सारे जोड़ों को,

हमने पल-पल देखा है||

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Comment

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Comment by ram shiromani pathak on May 25, 2013 at 10:14pm

बहुत सुन्दर रचना, बधाई 

Comment by Neeraj Nishchal on May 25, 2013 at 7:36pm
Bahut khoobsurat
Comment by Meena Pathak on May 25, 2013 at 6:31pm

डबडबाई आँखें छिपाते हुये,

कभी खुलकर ठहाके लगाते हुये

सँभलते-लड़खड़ाते हुये,

कभी रागिनी गुनगुनाते हुये.............................बहुत सुन्दर रचना, बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on May 25, 2013 at 5:56pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..
Comment by Abhinav Arun on May 25, 2013 at 4:39pm

achchhi rachna hai adarneey priyanka ji hardik badhai aapko !!

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