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ग्रीष्म और वर्षा का संगम -दोहों के माध्यम से

ग्रीष्म शुष्क लागत बदन, जागत तन में पीर.
मनुज, पशु, खगवृन्द सभी, खोजत शीतल नीर.

अरुण अनल अति उग्र हैं, तपस लगत चहुओर.
श्वेद बूँद भींगे बदन, अगन लगे अति घोर.

पल-पल बिजली जात हैं, बिजली घर में शोर.
दूरभाष की घंटिका,     बजन लगे घनघोर.

कोकिल कूके आम्र तरु, शीतल पवन न शोर.
वृन्द खगन के देखि के, नाचत मन में मोर.

वरुण,इंद्र, विनती सुनौ, बरस घटा घनघोर.
उमरि घुमरि मेघन परखी, नाचत वन में मोर.

मेघ घिरे नभ में सघन, कड़के बिजुरी घोर.
प्रियजन आहु, निरखु घटा, तृण छायो चहुओर.

मौलिक व अप्रकाशित 

--जवाहर 

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 6, 2013 at 5:36pm

आदरणीय सौरभ सर,  तृण छायो चहुओर से मेरा मतलब है धरती पर चारो ओर ... जब वर्षा होती है तो चारोतरफ घास उग आते हैं!

Comment by Ashok Kumar Raktale on June 3, 2013 at 12:14am

आदरणीय जवाहर जी भाई सादर, दोहों पर सुन्दर प्रयास हुआ है. सादर बधाई स्वीकारें. आदरणीया डॉ. प्राची जी की बात से मैं भी सहमत हूँ."उमरि घुमरि मेघन परखी,"= १४ मात्राएँ हैं.

Comment by बृजेश नीरज on June 2, 2013 at 11:32pm

आदरणीय जवाहर जी बहुत ही सुन्दर! आपको मेरी ढेरों बधाई!
एक दो जगह मात्रायें अधिक हैं शायद। उन्हें देख लें।
सादर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 1, 2013 at 11:39pm

आपका छंद प्रयास आश्वस्त करता है भाई जवहर जी.. .

तृण छायो चहुओर .. .. इसका क्या अर्थ ?

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 30, 2013 at 7:59am

आदरणीया कुंती जी, सादर अभिवादन !

उत्साह वर्धन के लिए आभार 
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 30, 2013 at 7:57am

आदरणीया डॉ. प्राची जी, सादर अभिवादन !

यह मेरा प्रयास मात्र है, आगे कोशिश करूंगा ज्यादा सहज बनाने का ... आपलोगों का मार्गदर्शन अपेक्षित है! 
Comment by coontee mukerji on May 28, 2013 at 2:25pm

जवाहर जी , अच्छी रचना है जो इस भीषण गरमी का सुंदर वर्णन है./

सादर

 कुंती .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 28, 2013 at 11:39am

दोहावली प्रस्तुतीकरण के लिए बधाई आ० जवाहर लाल सिंह जी 

आँचलिक/देशज  शब्दों को दोहावली में बहुत ज्यादा प्रयुक्त किया गया है.. जो मुझे कुछ असहज व आरोपित सा लगा. इनके बिना भी कथ्य बहुत स्पष्टता से अभिव्यक्त हो सकता था.

सादर.

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