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अतुकान्त/ अपना गांव

आज

बहुत दिनों बाद आया गांव

अपना गांव

जहां हुआ करते थे

महुआ, कटहल, आम

एक बाग भी।

खेलते थे गुल्ली डंडा

कभी कभी क्रिकेट भी।

अब वहां बाग नहीं है

उग आए हैं मकान।

 

एक नदी बहती थी

शांत, निर्मल।

ऊंचे कगारों पर

ढेर सारे जामुन के पेड़।

कगारों से फिसलते

हम पहुंच जाते किनारे

नदी में नहाते।

अब नदी सूख गयी

सिर्फ शेष रेत।

 

हथपुइया रोटी बनाती थीं

बड़ी अम्मा

नून, तेल चुपड़कर।

वह सोंधा स्वाद

अब भी है मुंह में।

लेकिन अब अम्मा नहीं।

 

अब कुछ भी नहीं

आम, जामुन, कटहल

अम्मा, बाग

कुछ नहीं।

सिर्फ हैं

ईंटों के मकान

सरपत और बबूल

ढेर सारे।

-        बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by ram shiromani pathak on June 8, 2013 at 2:35pm

वाह आदरणीय भाई ब्रिजेश जी क्या चित्रण किया है आपने/// चलो फिर हो जाये गिल्ली डंडा ////हा हा हा हा ///

मर्मस्पर्शि रचना//बहुत सुंदर . बहुत सुंदर . बहुत सुंदर ./////////हार्दिक बधाई।

Comment by बृजेश नीरज on June 8, 2013 at 9:49am

आदरणीया कुंती जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by coontee mukerji on June 8, 2013 at 9:45am

बहुत ही मर्मस्पर्शि रचना ,अब तो शहर सारे गाँव को खा रहे हैं सुरसा की तरह.

सादर / कुंती .

Comment by बृजेश नीरज on June 8, 2013 at 8:39am

आदरणीय निकोर जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by vijay nikore on June 7, 2013 at 11:48pm

इस संवेदनशील रचना के लिए बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by बृजेश नीरज on June 7, 2013 at 11:18pm

आदरणीय राजकुमार जी आपका आभार!

Comment by बृजेश नीरज on June 7, 2013 at 10:17pm

आदरणीया विनीता जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by Vinita Shukla on June 7, 2013 at 10:15pm

गाँव के परिदृश्य का सुंदर चित्रण करती हुई रचना. अपनी जड़ों से जुड़ने की कसक, मार्मिक रूप से व्यक्त हुई है. बधाई.

Comment by बृजेश नीरज on June 7, 2013 at 10:13pm

आदरणीय सौरभ जी आपका हार्दिक आभार!
आपकी रचना तो मानो पुरूस्कार स्वरूप आयी है मेरे लिए। जो गहनता है आपकी रचना में वह अप्रतिम है।
आपका पुनः आभार!

Comment by बृजेश नीरज on June 7, 2013 at 10:08pm

आदरणीय माथुर जी आपका आभार!

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