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आह करते हैं ,वाह करते हैं 

लोग हैं बस ,तबाह करते हैं 

रख के नफरत चाशनी में वो 

प्यार क्या बे-पनाह करते हैं 

कहके पैगाम दोस्ती  का है 

पीठ पीछे गुनाह करते हैं 

समझिए कुछ तो होनेवाला है 

जब वो तिरछी निगाह करते हैं 

आपकी नेकियों से उनको क्या 

काम है उनका स्याह ,करते हैं 

_________प्रो.विश्वम्भर शुक्ल ,लखनऊ 

(मौलिक ,अप्रकाशित )

Views: 589

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Comment by aman kumar on June 21, 2013 at 1:30pm

कहके पैगाम दोस्ती  का है 

पीठ पीछे गुनाह करते हैं 

बहुत गहरी सोच के साथ रची गयी है ........

आभार 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 20, 2013 at 1:54pm

आदरनीय बिश्व्म्भर जी ..बहुत ही अच्छी ग़ज़ल ...

रख के नफरत चाशनी में वो 

प्यार क्या बे-पनाह करते हैं  खास रूप से पसंद आया 

Comment by vijay nikore on June 20, 2013 at 11:49am

अच्छा कहा है।

बधाई, विश्वम्भर जी।

विजय निकोर

Comment by बृजेश नीरज on June 20, 2013 at 8:59am

बहुत ही सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Pragya Srivastava on June 20, 2013 at 12:23am

आ0 विश्वम्भर जी,          

  सुंदर रचना ............................ बधाई

Comment by ram shiromani pathak on June 19, 2013 at 9:42pm

आ0 विश्वम्भर  जी,  बहुत सुन्दर रचना //हार्दिक  बधाई 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 19, 2013 at 8:34pm

आ0 विश्वम्भर सर जी,  वाह! बहुत सुन्दर गजल हुई है।  हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 19, 2013 at 6:18pm

रख के नफरत चाशनी में वो 

प्यार क्या बे-पनाह करते हैं ... क्या कहने है महोदय!

Comment by coontee mukerji on June 19, 2013 at 4:27pm

रख के नफरत चाशनी में वो 

प्यार क्या बे-पनाह करते हैं ...............कितनी सच्ची बात कही है . सादार / कुंती.

Comment by Shyam Narain Verma on June 19, 2013 at 3:05pm
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ..............

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