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कविता में प्रेम


उसने मुझसे कहा

ये क्या लिखते रहते हो

गरीबी के बारे में

अभावों, असुविधाओं,

तन और मन पर लगे घावों के बारे में

रईसों, सुविधा-भोगियों के खिलाफ

उगलते रहते हो ज़हर

निश-दिन, चारों पहर

तुम्हे अपने आस-पास

क्या सिर्फ दिखलाई देता है

अन्याय, अत्याचार

आतंक, भ्रष्टाचार!!

और कभी विषय बदलते भी हो

तो अपनी भूमिगत कोयला खदान के दर्द का

उड़ेल देते हो

कविताओं में

कहानियों में

क्या तुम मेरे लिए

सिर्फ मेरे लिए

नहीं लिख सकते प्रेम-कवितायें...

मैं तुम्हे कैसे बताऊँ प्रिये

कि बेशक मैं लिख सकता हूँ

कवितायें सावन के फुहारों की

रिमझिम बौछारों की

उत्सव-त्योहारों की कवितायें

कोमल, सांगीतिक छंद-बद्ध कवितायें

लेकिन तुम मेरी कविताओं को

गौर से देखो तो सही

उसमे तुम कितनी ख़ूबसूरती से छिपी हुई हो

जिन पंक्तियों में

विपरीत परिस्थितियों में भी

जीने की चाह लिए खडा दीखता हूँ

उसमें तुम्ही तो मेरी प्रेरणा हो...

तुम्ही तो मेरा संबल हो.....

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Comment

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Comment by Saurabh Pandey on July 3, 2013 at 9:44pm

भाव समृद्ध रचना पर विलम्ब से आ पाने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ, आदरणीय अनवर सुहैल जी.

एक ऐसी रचना जो मनस तपस्वी के सामर्थ्य को अर्पित है.

बधाई स्वीकार करें आदरणीय

Comment by बृजेश नीरज on June 24, 2013 at 6:09pm

अहहा! वाह! बहुत सुन्दर! जीवन को करीब से देखने और जीने वाले के लिए संबल वास्तव में प्रेम ही होता है जो अंतर्मन में बहता रहता है और छलकता भी है तो सिर्फ पसीने की बूंदों के रूप में।
इस सच्ची भावना में पगी रचना के लिए मेरी हार्दिक बधाई!

Comment by D P Mathur on June 22, 2013 at 8:17am

सच्चाई है ,
हमारा चारों तरफ के माहौल पर ध्यान जल्दी जाता है,
बहुत सुन्दर , आपको बधाई !

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 22, 2013 at 5:26am

जिन पंक्तियों में

विपरीत परिस्थितियों में भी 

जीने की चाह लिए खडा दीखता हूँ 

उसमें तुम्ही तो मेरी प्रेरणा हो...

तुम्ही तो मेरा संबल हो...

 वाह वाह!

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