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अपना और पराया मौन:
अकुलाया अकुलाया मौन.
जीवन यज्ञ आहुति श्वास ;
धडकन मन्त्र बनाया मौन .
बोलना पीतल;यह सोना है ;
जो हम ने अपनाया मौन .
कभी सुहाग सेज पे लेटा;
शर्माया, सुकुचाया मौन.
कभी विरहाग्नि ने जी भर ;
तरसाया तरपाया मौन.
तिल तिल पलपल ही जीवनभर
देता साथ सुहाया मौन .
प्रेम पगी मीरा का मोहन ;
प्रेम गगन पर छाया मौन .
नाव की ठांव बना कबहूँ यह ;
कबहूँ पतवार बनाया मौन .
श्वासों की माला पे हमने ;
हर दिनरात फिराया मौन

दीप जीरवी

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Comment by DEEP ZIRVI on December 8, 2010 at 4:20pm
धन्यवाद
Comment by Bhasker Agrawal on December 8, 2010 at 3:00pm
केसी अदभुत कला है आपकी..
वाणी से दर्शाया मोन
Comment by asha pandey ojha on December 7, 2010 at 10:37am
वाह...!!! मौन का यह मौन मुखरित होकर बोलना ... एक कशमकश ...एक अहसास ,,मौन की वेदना .. ये मौन सी रचना .. बहुत खूब लगी
...... शर्माया, सुकुचाया मौन.
कभी विरहाग्नि ने जी भर ;
तरसाया तरपाया मौन.
तिल तिल पलपल ही जीवनभर
देता साथ सुहाया मौन .
प्रेम पगी मीरा का मोहन ;
प्रेम गगन पर छाया मौन बहुत कमाल
Comment by Lata R.Ojha on December 7, 2010 at 9:23am
ati sundar..

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